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नाहरगढ़ की अरावली में बसा 2100 वर्ष पुराना भूतेश्वर नाथ धाम

Bhuteshwar Nath Dham

Bhuteshwar Nath Dham

जयपुर। छोटी काशी के नाम से विख्यात जयपुर में आस्था और रहस्य का अनोखा संगम देखने को मिलता है। आमेर क्षेत्र स्थित नाहरगढ़ अभयारण्य की गहराई में अरावली की ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों के बीच करीब 2100 वर्ष प्राचीन भूतेश्वर नाथ महादेव मंदिर श्रद्धा और रोमांच का केंद्र बना हुआ है। शहर की चहल-पहल से दूर घने जंगलों में स्थित यह धाम लोककथाओं और आध्यात्मिक मान्यताओं के कारण विशेष पहचान रखता है।

लोकमान्यता है कि यहां स्थापित शिवलिंग स्वयंभू है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में इस निर्जन स्थान पर इंसानों से पहले भूत-प्रेत महादेव की आराधना करने आते थे, इसी कारण इसका नाम ‘भूतेश्वर’ पड़ा। बाद में एक सिद्ध संत ने यहां कठोर तपस्या की, जिससे आसुरी शक्तियां दूर हो गईं और यह स्थान साधना व श्रद्धा का केंद्र बन गया।

मंदिर महंत ओमप्रकाश पारीक ने बताया कि मंदिर में सेवा करने वाली उनकी 13वीं पीढ़ी है। एक समय यह स्थान घने जंगल और सन्नाटे से घिरा था। संत की तपस्या के बाद महादेव यहां ‘भूतेश्वर’ रूप में प्रतिष्ठित हुए। मंदिर परिसर में चार सिद्ध संतों की समाधियां भी स्थित हैं। मान्यता है कि इनमें से एक संत ने यहीं जीवित समाधि ली थी, जबकि अन्य तीन संत देवलोक गमन कर गए। उनकी प्राचीन धूणा आज भी सुरक्षित है, जहां आम लोगों का प्रवेश वर्जित रखा गया है, ताकि साधना की पवित्रता बनी रहे।

शिवरात्रि पर यहां विशेष उत्सव का आयोजन होता है। हालांकि मंदिर तक पहुंचना आसान नहीं है। श्रद्धालुओं को नाहरगढ़ अभयारण्य के भीतर लगभग आठ किलोमीटर तक अरावली की पहाड़ियों और घने जंगलों से होकर गुजरना पड़ता है। कठिन मार्ग के बावजूद भक्त बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं।

मंदिर की स्थापत्य शैली में मुख्य मंडप और गुंबद 17वीं शताब्दी की झलक देते हैं। समय के साथ कुछ आधुनिक बदलाव हुए हैं। लेकिन प्राकृतिक परिवेश के बीच इसकी आध्यात्मिक आभा आज भी अक्षुण्ण है।

यह धाम जयपुर की स्थापना (1727) से भी पुराना माना जाता है। आमेर में कच्छवाहा राजवंश के समय से यह स्थान आध्यात्मिक साधना का केंद्र रहा है। स्थानीय लोगों में भूतेश्वर नाथ के प्रति गहरी आस्था है और मान्यता है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना यहां अवश्य पूर्ण होती है।

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