जयपुर के स्कूली छात्र अर्जुन पटेल ने डिजाइन किया AI-संचालित स्मार्ट ग्लास ‘साइटसेंस’

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Jaipur school student Arjun Patel designs AI-powered smart glasses 'Sightsense'
Jaipur school student Arjun Patel designs AI-powered smart glasses 'Sightsense'

जयपुर। भारत में ब्लाइंड या दृष्टिबाधित लोगों की संख्या 62 मिलियन से अधिक है, और इसमें से सिर्फ 15% लोगों के पास ही उन्नत तकनीकी उपकरणों की सुविधा है। जिसका असर न सिर्फ उनकी स्वतंत्रता, शिक्षा और रोज़गार पर पड़ता है, बल्कि सामाजिक समावेशन में भी भारी बाधाएं पैदा करता है। इसका कारण इन उपकरणों की उच्च लागत, इंटरनेट पर निर्भरता और ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित पहुंच है।

इसी समस्या को दूर करने के उद्देश्य से जयपुर के 16 वर्षीय अर्जुन पटेल ने दृष्टिबाधित लोगों के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)-संचालित एक किफायती स्मार्ट ग्लास ‘साइटसेंस’ तैयार किया है। वे जयपुर के जयश्री पेरीवाल इंटरनेशनल स्कूल में कक्षा 12वीं के छात्र हैं।

‘साइटसेंस’ सिर्फ एक स्मार्ट चश्मा नहीं, बल्कि कई फीचर्स वाला एक अनोखा सहायक उपकरण है। यह चश्मा दृष्टिबाधित व्यक्तियों को रोजमर्रा की जिंदगी में मदद करने के लिए रीयल-टाइम वॉयस फीडबैक देता है। इसके अतिरिक्त, यह चश्मा 1 लाख से अधिक वस्तुओं की पहचान करने में सक्षम है, 243 भाषाओं में लिखे गए टेक्स्ट को पढ़ सकता है, रास्ता बताने के लिए इसमें जीपीएस सिस्टम भी मौजूद है और विभिन्न प्रकार की मुद्रा (करेंसी) की पहचान कर सकता है।

यही नहीं, इसमें एक एआई सहायक भी है, जो सवालों के जवाब भी दे सकता है, ठीक वैसे ही जैसे अमेज़न की ऐलेक्सा काम करती है। यह चश्मा महज 15,000 हजार रुपए की लागत में तैयार किया गया है, जबकि बाज़ार में इसी तरह के उपकरण 1.5 लाख रुपए तक में मिलते हैं। ‘साइटसेंस’, जो मौजूदा उपकरणों की तुलना में दस गुना सस्ता है, समस्या का सीधा और प्रभावी समाधान पेश करता है।

इस नवाचार के पीछे के विचार के बारे में अर्जुन बताते हैं, “मैं जब पिछले साल जयपुर स्थित एक एनजीओ में गया, जो दृष्टिबाधित बच्चों के लिए काम करता है। वहां मैंने देखा कि बच्चे पुराने उपकरणों का इस्तेमाल कर रहे थे, जो ठीक से काम भी नहीं कर रहे थे।

जब मैंने एक शिक्षक से पूछा कि वे नई तकनीक का इस्तेमाल क्यों नहीं करते, तो उन्होंने कहा, ‘हम उसे खरीदने में समर्थ नहीं हैं।’ तभी मुझे समझ आया कि असली समस्या तकनीक और नवाचार की कमी नहीं, बल्कि उसकी ऊंची कीमत है। तभी मैंने तय किया कि मैं एक ऐसा समाधान बनाऊंगा जो सभी की पहुंच में हो और सुलभ हो, वहीं से ‘साइटसेंस’ की शुरुआत हुई।”

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