फर्जी डिग्री और खेल प्रमाण पत्र जारी करने के मामले में एसओजी ने विश्वविद्यालयों के मालिक सहित 3 लोगों को किया गिरफ्तार

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SOG arrested 3 people including the owner of universities
SOG arrested 3 people including the owner of universities

जयपुर। स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) ने फर्जी डिग्री और खेल प्रमाण पत्र जारी करने के मामले मे शुक्रवार को विश्वविद्यालयों के मालिक सहित तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। प्रदेश में फर्जी डिग्री और खेल प्रमाण पत्र के माध्यम से कई विभागों ने नौकरी लगने के मामले का एसओजी ने खुलासा किया था। इस मामले में एसओजी कई अभ्यर्थियों को गिरफ्तार कर चुकी है। इस मामले में दलाल सहित विश्वविद्यालयों में कार्यरत स्टाप को भी पकड़ा जा चुका है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रमों की फर्जी डिग्री व खेल प्रमाण पत्र जारी करने के संबंध में दर्ज मामले में एसओजी ने ओपीजेएस विश्वविद्यालय और सनराइज विश्वविद्यालय अलवर, एमके विश्वविद्यालय पाटन गुजरात का मालिक व एक अन्य आरोपी को गिरफ्तार किया है।

अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक एटीएस एवं एसओजी वी के सिंह ने बताया कि फर्ज डिग्री मामले में वांछित आरोपी जोगेन्द्र सिंह पुत्र ओमप्रकाश दलाल निवासी चिडी रोहतक हाल हरियाणा, जितेन्द्र यादव पुत्र जिले सिंह जाति यादव निवासी सिंघाना रोड बाइपास, महावीर पुलिस चौकी नारनौल हरियाणा,सरिता कड़वासरा पुत्री धर्मवीर सिंह निवासी ओमेक्स सीटी, रोहतक हरियाणा को गिरफ्तार किया गया है। इस मामले में एसओजी पूर्व में छह आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है।

वी के सिंह ने बताया कि एसओजी द्वारा इस प्रकरण में ओपीजेएस विश्वविद्यालय के मालिक और संस्थापक जोगेन्द्र सिंह दलाल, एमके विश्वविद्यालय पाटन गुजरात व सनराइज विश्वविद्यालय अलवर के मालिक एवं पार्टनर जितेन्द्र यादव तथा एक अन्य ओपीजेएस विश्वविद्यालय की पूर्व रजिस्ट्रार व चैयरपर्सन को गिरफ्तार किया गया है। ओपीजेएस विश्वविद्यालय के संस्थापक जोगेन्द्र सिंह द्वारा शाहबाद (बांरा) में वैदिक विश्वविद्यालय स्थापित करने जा रहा है, इसी प्रकार जितेन्द्र यादव लाखेरी, बूंदी में जीत विश्वविद्यालय स्थापित करने जा रहा है, जितेन्द्र यादव ओपीजेएस विश्वविद्यालय में 2015 से 2020 तक रजिस्ट्रार के पद पर कार्यरत रहा है।

जितेन्द्र यादव द्वारा रतनगढ़ चूरू में जीत रिसोर्ट का संचालन किया जा रहा है। प्रकरण में गिरफ्तार सरिता कड़वासरा ओपीजेएस विश्वविद्यालय में वर्ष 2013 से 2015 तक रजिस्ट्रार एवं वर्ष 2015 से 2020 तक चेयरपर्सन के रूप में कार्यरत रही है। प्रकरण के अनुसंधान के दौरान जब भी ओपीजेएस से रिकॉर्ड मांगा गया तो उन्होंने रिकॉर्ड दिसम्बर 2019 में लगी आग में नष्ट होना बताया गया , जबकि निदेशालय, लोकसेवा आयोग और कर्मचारी चयन बोर्ड द्वारा जब भी दस्तावेज सत्यापन के लिए भेजा जाता है तो उनका सत्यापन किया जाता है।

अभियुक्तों द्वारा बैंक डेट में सैंकड़ों फर्जी डिग्रीयां जारी की गई। इसके अलावा मान्यता से पूर्व ही बीएड व बीपीएड की डिग्रियां भी जारी की गई। बिना मान्यता कोर्स संचालित करना व डिग्री जारी की गई। इसमें एमएससी और एग्रीकल्चर की डिग्रिया शामिल है। इसके अलावा फर्जी प्रवेश दिखाकर खेल प्रमाण पत्र जारी करना पाया गया है। गिरफ्तार अभियुक्तों से अन्य अभियुक्तों के बारे में पूछताछ व अनुसंधान किया जा रहा है। प्रकरण में अन्य चाछित आरोपियों की तलाश जारी है।

गर्लफ्रेंड पहले रजिस्टार थी, फिर चेयरपर्सन बनी

डीआईजी परिस देशमुख ने बताया ने बताया कि ओपीजेएस यूनिवसिर्टी के संचालक जोगेन्द्र सिंह की गर्लफ्रेंड सरिता कड़वासरा (50) पुत्री धर्मवीर सिंह को भी रोहतक से डिटेन किया है। एसओजी को ओपीजेएस यूनिवसिर्टी के खिलाफ फर्जी डिग्री जारी करने की काफी शिकायतें मिली थी। जो चूरू के राजगढ़ में है। जांच में सामने आया है कि साल-2013 में ओपीजेएस यूनिवसिर्टी शुरू हुई थी। साल-2013 से साल-2015 तक ओपीजेएस यूनिवसिर्टी की रजिस्ट्रार के पद पर सरिता रही है। साल-2017 से साल-2020 तक सरिता चेयरपर्सन रही। साल-2015 से साल-2020 तक जितेन्द्र यादव ओपीजेएस यूनिवसिर्टी में रजिस्ट्रार के पद पर रहा। इस दौरान ओपीजेएस यूनिवसिर्टी की ओर से हजारों की संख्या में फर्जी डिग्री जारी की गई।

पाटर्नरशिप छोड़ खुद की खोली यूनिवसिर्टी

परिस देशमुख ने बताया कि साल-2020 में आरोपी जितेन्द्र यादव ने ओपीजेएस यूनिवरसिटी की पार्टनरशिप छोड़ दी। उसके बाद उसने अलवर में खुद की सनराइज यूनिवरसिटी खोल ली। कुछ समय बाद ही एमके यूनिवसिर्टी पाटन गुजरात में खोली। इसके बाद बूंदी में एक नई जीत यूनिवसिर्टी खोलने की तैयारी चल रही थी। यूनिवसिर्टी की मान्यता अभी सरकार से नहीं मिली थी। वहीं, आरोपी जोगेन्द्र सिंह शाहबाद (बांरा) में वैदिक यूनिवसिर्टी खोलने की तैयारी में था। इसका कैम्पस बनकर तैयार हो गया है।
जांच में सामने आया है कि दलालों के जरिए फर्जी डिग्री बांटने का खेल चल रहा था। बिना मान्यता कोर्स के भी यूनिवसिर्टी की ओर से फर्जी सर्टिफिकेट और डिग्री जारी की गई।

फर्जीवाड़े पर टिकी थी पूरी यूनिवसिर्टी

डीआईजी ने बताया- जांच में सामने आया है कि आरोपी यूनिवसिर्टी संचालकों की ओर से एडिमशन में भी फर्जीवाड़े किए। बैक डेट में एडमिशन दिए गए है। दलालों के साथ मिलकर फर्जी खेल प्रमाण-पत्र जारी करने का बिजनेस किया गया। गलत तरीके से गेम खिलाकर फर्जी खेल प्रमाण-पत्र देकर यूनिवसिर्टी में एडमिशन दिए गए। इन्होंने अपनी जालसाजी छिपाने के लिए साल-2016 से साल-2020 तक का रिकॉर्ड जलना बताया है। दूसरी तरफ डिग्री वेरिफिकेशन का संबंधित डिपार्टमेंट को गलत या सही का जबाव दिया जा रहा था।

यूनिवसिर्टी में कुल 27 लोगों का स्टाफ

परिस देशमुख ने बताया कि यूनिवसिर्टी में टीचर्स के बारे में रिकॉर्ड देखने पर भी फर्जीवाड़ा सामने आया। यूनिवसिर्टी में 27-28 लोगों का सैलेरी अकांउट है। इनमें से 8-10 नॉन टीचर स्टाफ हैं। यूनिवसिर्टी में चलने वाले कोर्स की संख्या 18 है। 18 कॉर्स करवाने के लिए यूनिवसिर्टी के पास 27-28 लोग ही हैं। ये भी बड़ा फजीवाड़ा है। काफी सारी विसंगतियां सामने आने पर पूरी यूनिवसिर्टी की नींव ही फर्जीबाड़े पर बनी सामने आ रही है। यूनिवसिर्टी का काम सिर्फ फर्जी डिग्री बांटने का था। आरोपी जोगेन्द्र सिंह के खिलाफ पूर्व में दो केस दर्ज हैं। इसमें अरेस्ट भी हो चुका है।

सबसे ज्यादा नॉर्थ इंडिया में बांटी फर्जी डिग्री

राजस्थान के विभिन्न डिपार्टमेंट में फर्जी डिग्रियों से सरकारी डिपार्टमेंट में लोग जॉब कर रहे है। शिक्षा विभाग को इस संबंध में अवगत करवाया गया है। विभाग की ओर से दोबारा वेरिफिकेशन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। जांच में सामने आया है कि यूनिवसिर्टी की ओर से सबसे ज्यादा फर्जी डिग्री नॉर्थ इंडिया में बांटी गई है। यूनिवरसिटी की ओर से सौदा तय होने पर एडमिशन दिखाकर फर्जी डिग्री बांटी गई। फर्जी डिग्री देने के दौरान स्टूडेंट्स से 50-60 प्रतिशत ज्यादा रकम की डिमांड की जाती।

स्टूडेंट के सौदे की रकम ही देने की जिद पर डिग्री दे दी जाती थी। सरकारी जॉब के लिए विभाग की ओर से यूनिवसिर्टी से डिग्री वेरिफिक के लिए जबाव मांगने पर मना कर दिया जाता। स्टूडेंट के विश्वविद्यालय से दोबारा कॉन्टैक्ट करने पर पहले मांगी गई रकम का तकाजा किया जाता। रुपए देने पर दोबारा विभाग को यूनिवसिर्टी की तरफ से गलती से रिपोर्ट भेजने का जबाव देकर वेरिफिकेशन करवा देते थे।

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