अनहद श्रृंखला में अश्विनी भिड़े-देशपांडे ने बांधा सुरों का समां

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जयपुर। कड़ाके की सर्दी के बावजूद शनिवार शाम जवाहर कला केंद्र के मध्यवर्ती प्रांगण में संगीत प्रेमियों का उत्साह देखते ही बना, जब स्पिकमैके व राजस्थान पर्यटन विभाग के तत्वावधान में चल रही “अनहद” श्रृंखला की पाँचवीं प्रस्तुति आयोजित हुई। मुंबई की विख्यात शास्त्रीय गायिका पद्मश्री डॉ. अश्विनी भिड़े-देशपांडे ने अपने सधे और भावपूर्ण स्वरों से श्रोताओं को रसविभोर कर दिया।

डॉ. भिड़े ने संधिप्रकाश काल के राग श्री से कार्यक्रम की शुरुआत की। विलंबित तीन ताल में निबद्ध बंदिश “कहां गुरु मैं ढूंढन जाऊं” तथा द्रुत तीन ताल की बंदिश “ऐ री है तो आस ना गैली” के माध्यम से उन्होंने राग के श्रृंगार और विरह भावों को प्रभावी ढंग से उकेरा। इसके बाद राग दुर्गा में साढ़े नौ मात्रा की बंदिश “माता कालिका” से वातावरण भक्तिमय हो उठा। समापन पर प्रस्तुत द्रुत तराना उनकी लयकारी और तानकारी का उत्कृष्ट उदाहरण रहा।

हारमोनियम पर ध्यानेश्वर सोनावणे और तबले पर प्रणव गुरव की संगत ने प्रस्तुति को और समृद्ध किया। संयोजक अनु चंडोक व हिमानी खींची ने बताया कि शनिवार को आयोजित यह निशुल्क कार्यक्रम खुले परिसर में हुआ, जहां ठंड से राहत के लिए गैस अलाव की व्यवस्था की गई। जयपुर-अतरौली घराने की इस वरिष्ठ गायिका की प्रस्तुति ने “अनहद” श्रृंखला की शाम को यादगार बना दिया।

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