
जयपुर। मुख्य सोडाला स्थित सत्यवादी वीर तेजाजी धाम एवं तेजेश्वर महादेव मंदिर में शनिवार को 952वां वीर तेजाजी जन्मोत्सव श्रद्धा, आस्था और उत्साह के साथ मनाया गया। माघ मास की चतुर्दशी के शुभ अवसर पर आयोजित जन्मोत्सव में सुबह से ही श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ पड़ी। जिससे पूरा मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से सराबोर हो गया।
मंदिर पुजारी मूलचंद शर्मा ने बताया कि जन्मोत्सव के अवसर पर प्रातःकाल विशेष पूजा-अर्चना के साथ कार्यक्रमों की शुरुआत की गई। वीर तेजाजी महाराज का विधिवत अभिषेक, श्रृंगार एवं आरती संपन्न कराई गई। इसके पश्चात श्रद्धालुओं ने दर्शन कर बाबा तेजाजी से सुख-समृद्धि और संकट निवारण की कामना की।
जन्मोत्सव के दौरान तेजेश्वर महादेव मंदिर में भी विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए गए। श्रद्धालुओं ने भगवान शिव का जलाभिषेक कर पूजा-अर्चना की। मंदिर परिसर को फूल-मालाओं एवं सजावटी विद्युत झालरों से आकर्षक ढंग से सजाया गया। जिससे उत्सव का उल्लास और बढ़ गया।
भक्तों ने परंपरा के अनुसार बाबा तेजाजी का केक काटकर जन्मोत्सव मनाया, वहीं भजन-कीर्तन और बधाई गान से वातावरण गूंज उठा। दिनभर श्रद्धालुओं का आवागमन बना रहा और देर शाम तक दर्शन के लिए कतारें लगी रहीं। इस दौरान बाबा की फूलों की झांकी सजाई गई। जो श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रही।
वहीं कार्यक्रम के अंत में महाआरती का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता निभाई। इसके पश्चात विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। जिसमें सैकड़ों श्रद्धालुओं ने प्रसादी पाई। इस दौरान मंदिर स्वयंसेवकों ने व्यवस्थाओं को संभालते हुए श्रद्धालुओं की सुविधा का विशेष ध्यान रखा।
गौरतलब है कि वीर तेजाजी महाराज का जन्म विक्रम संवत 1130 ( जनवरी 1074 ई.) को राजस्थान के नागौर जिले के खरनाल गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम ताहड़देव (धोलिया जाट) तथा माता का नाम रामकंवरी बताया गया है। बचपन से ही तेजस्वी व्यक्तित्व के कारण उनका नाम तेजाजी पड़ा। उनका विवाह रायला गांव के सरदार रायमल की पुत्री पेमल से हुआ था।
लोक मान्यताओं के अनुसार वीर तेजाजी ने एक गाय की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। वचन निभाने के लिए उन्होंने जीवित रहते हुए सर्प से डसवाया और भाद्रपद शुक्ल दशमी (विक्रम संवत 1103) को उनका निधन हुआ। उनकी पत्नी पेमल भी उनके साथ सती हो गई थीं।
राजस्थान में वीर तेजाजी को लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है। उन्हें भगवान शिव का अंशावतार माना जाता है और विशेष रूप से सर्पदंश से रक्षा करने वाले देवता के रूप में श्रद्धालु उनकी आराधना करते हैं। मान्यता है कि वीर तेजाजी के आशीर्वाद से सर्प विष का प्रभाव समाप्त हो जाता है।


















