दादागुरु श्री जिनदत्त सूरी चादर महोत्सव : श्रद्धा, इतिहास और सामाजिक चेतना का महापर्व

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जयपुर । जैन श्वेतांबर खरतरगच्छ परंपरा के प्रथम दादागुरु श्री जिनदत्त सूरी की स्मृति में आगामी 6 से 8 मार्च 2026 को जैसलमेर में आयोजित होने जा रहा चादर महोत्सव श्रद्धा, इतिहास और सामूहिक सांस्कृतिक चेतना का एक ऐतिहासिक आयोजन होगा। यह जानकारी आज 31 जनवरी को मोती डूंगरी रोड स्थित जयपुर दादाबाड़ी में आयोजित सकल जैन समाज के पदाधिकारियों की बैठक में चादर महोत्सव समिति के समन्वयक प्रकाशचंद लोढ़ा ने दी।

बैठक में ज्योति कुमार कोठारी ने बताया कि, यह महोत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि दादागुरु श्री जिनदत्त सूरी की साधना, करुणा, सांस्कृतिक एकात्मता तथा सामाजिक समरसता की परंपरा को समर्पित एक जीवंत सांस्कृतिक पर्व है। दादागुरु के स्वर्गवास के पश्चात उनके अग्निसंस्कार के समय चादर एवं साधना-सामग्री का अग्नि से अप्रभावित रहना उनकी उच्च आध्यात्मिक साधना और आत्मिक तेज का प्रतीक माना जाता है। यही चादर आज श्रद्धालुओं के लिए विघ्नहर्ता एवं कल्याणकारी आस्था का केंद्र बनी हुई है।

ऐतिहासिक दृष्टि से अजयमेरु (अजमेर) के तत्कालीन चौहान वंशीय शासक अर्णोराज (पृथ्वीराज चौहान के पितामह) दादागुरु श्री जिनदत्त सूरी को अपना गुरु मानते थे। उनके द्वारा प्रदत्त भूमि पर ही दादागुरु देव का अग्नि-संस्कार संपन्न हुआ। यह चादर बाद में अजमेर से अन्हिलपुर पाटन (गुजरात) ले जाई गई। लगभग 150 वर्ष पूर्व जैसलमेर में महामारी फैलने पर जैसलमेर के महारावल के निवेदन पर यह चादर जैसलमेर लाई गई, जहाँ से आज तक यह जैसलमेर के ज्ञान भंडार में सुरक्षित संरक्षित है। दादागुरु के स्वर्गवास के 872 वर्ष पश्चात पहली बार इस चादर का विधिवत अभिषेक जैसलमेर में किया जाएगा।

महोत्सव परम पूज्य गच्छाधिपति आचार्य श्री मणिप्रभ सूरीश्वर जी महाराज, अन्य पूज्य आचार्यों, शताधिक जैन साधु-साध्वियों तथा वैदिक परंपरा के लगभग 200 संतों के सान्निध्य में संपन्न होगा। देश-विदेश से 15 से 20 हजार श्रद्धालुओं की सहभागिता अपेक्षित है।

कार्यक्रमों की श्रृंखला के अंतर्गत 6 मार्च को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूज्य सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत जी इस ऐतिहासिक आयोजन का उद्घाटन करेंगे। 7 मार्च को भव्य बरघोड़े के साथ चादर को महोत्सव स्थल पर लाया जाएगा, जहाँ श्रद्धालुओं द्वारा विधिपूर्वक अभिषेक किया जाएगा।

इसी दिन दोपहर को सम्पूर्ण विश्व में 1 करोड़ 8 लाख (108,00,000) भक्तों द्वारा ‘दादागुरु इकतीसा’ का सामूहिक पाठ किया जाएगा। इकतीसा पाठ समिति के राष्ट्रीय संयोजक ज्योति कोठारी ने बताया कि यह सामूहिक पाठ सांस्कृतिक एकात्मता एवं सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने वाला एक आध्यात्मिक महाकुंभ सिद्ध होगा।

प्रवक्ताओं ने रेखांकित किया कि दादागुरु श्री जिनदत्त सूरी (11वीं–12वीं शताब्दी) केवल जैन आचार्य ही नहीं थे, बल्कि मध्यकालीन भारत में सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक एकात्मता और नैतिक पुनर्निर्माण के प्रमुख स्तंभ थे। राजस्थान और गुजरात के सामाजिक जीवन में उनका स्थान वही रहा है, जो अद्वैत परंपरा में आदि शंकराचार्य और गुजरात में आचार्य हेमचंद्र का माना जाता है।

अजमेर के चौहान शासक अर्णोराज, त्रिभुवनगिरि (तिम्मणगढ़) के राजा कुमारपाल सहित अनेक राजपूत शासक उनके प्रति श्रद्धावान थे। उनके उपदेशों ने क्षत्रिय समाज में संयम, मर्यादा और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को सुदृढ़ किया। साथ ही उन्होंने समाज के वंचित और हाशिये पर खड़े वर्गों को भी सांस्कृतिक सम्मान और नैतिक संरक्षण प्रदान किया।

महोत्सव के अंतर्गत “भारतीय सांस्कृतिक एकात्मता एवं सामाजिक समरसता में दादागुरु परंपरा का योगदान” विषय पर एक विद्वत संगोष्ठी का आयोजन भी किया जाएगा, जिसमें देशभर के विद्वान, शोधार्थी और सामाजिक चिंतक सहभागिता करेंगे।

कार्यक्रम का शुभारम्भ साध्वी श्री विजयप्रभा, श्रमण संघीय उप प्रवर्तिनी दिव्यप्रभा एवं प्रशमरसा के मंगलाचरण से हुआ. सभा में विश्व हिन्दू परिषद् के प्रान्त उपाध्यक्ष सुभद्र पापड़ीवाल, महावीरजी तीर्थ के अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता सुधांशु कासलीवाल, राजस्थान जैन सभा के मंत्री मनीष बैद, भारतीय जैन संघटना के सचिव यश बाफना, जीतो के आगम जैन, मानसरोवर संघ के अध्यक्ष महेंद्र जैन, मंत्री नरेंद्र राज दुगड़, खरतर गच्छ संघ के अध्यक्ष पदम् पुगलिया, जवाहर नगर संघ के मंत्री नितिन दुगड़, खरतर गच्छ महिला मंडल की सचिव माला बेगानी, अक्षत बिल्डर्स के सुनील जैन, श्वेताम्बर जैन विद्यालय के मंत्री सुभाष गोलेच्छा, संतोष छाजेड़,सुनिश मारू, राजकुमार बाफना, जीतेन्द्र जैन पल्लीवाल, आदि अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहकार अपने विचार व्यक्त किये। सभी ने विश्व भर में होनेवाले 1 करोड़ 8 लाख इकतीसा पाठ को अभूतपूर्व आयोजन बताते हुए इसमें तन, मन, धन से जुड़ने का आह्वान किया।

वक्ताओं ने कहा कि देश-विदेश में फैली हजारों दादाबाड़ियाँ आज भी दादागुरु श्री जिनदत्त सूरी की जीवंत विरासत की साक्षी हैं, जहाँ लाखों श्रद्धालु दर्शन कर अपने को धन्य मानते हैं। चादर महोत्सव इसी सतत जीवित परंपरा का एक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्रेरणादायी उद्घोष है।

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