
जयपुर। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर इस वर्ष महाशिवरात्रि पर्व श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा। यह पर्व 15 फरवरी को मनाया जाएगा। शिव का अर्थ है ‘सदा कल्याणकारी’। महाशिवरात्रि शिवतत्व की रात्रि है, जो मोक्ष प्रदान करने वाली मानी जाती है।
व्रत, जागरण और रुद्राभिषेक से दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। स्कंद पुराण और शिव पुराण में महाशिवरात्रि को मोक्षदायिनी रात्रि बताया गया है। महाशिवरात्रि के साथ ही माघ मेला का अंतिम स्नान पर्व भी संपन्न होगा, जिसके बाद मेला क्षेत्र से संत-महात्मा और श्रद्धालु अगले वर्ष पुन: आने का संकल्प लेकर तीर्थराज प्रयाग से विदा होंगे।
ज्योतिषाचार्य डॉ. महेन्द्र मिश्रा के अनुसार त्रयोदशी तिथि 14 फरवरी को अपराह्न 3.11 बजे से प्रारंभ होकर 15 फरवरी को शाम 4.23 बजे तक रहेगी। इसके बाद चतुर्दशी तिथि लगेगी, जो महाशिवरात्रि पर्व के लिए अनिवार्य मानी जाती है। महाशिवरात्रि की रात्रि में विशेष पूजा-अर्चना का विधान है।
उन्होंने बताया कि 15 फरवरी को शाम 7.28 बजे तक उत्तराषाढ़ा नक्षत्र रहेगा तथा इसके बाद श्रवण नक्षत्र का आरंभ होगा। वहीं कुंभ राशि में सूर्य, बुध, शुक्र और राहु के एक साथ संचरण से दुर्लभ चतुर्ग्रहीय योग बन रहा है। इस विशेष योग में स्नान, दान और शिव उपासना से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
डॉ. मिश्रा के अनुसार यौगिक परंपरा में भगवान शिव को देवता नहीं बल्कि आदिगुरु अर्थात प्रथम गुरु माना गया है। शिव से ही ज्ञान की उत्पत्ति मानी जाती है। मान्यता है कि सहस्त्राब्दियों के ध्यान के उपरांत जिस दिन भगवान शिव कैलाश पर्वत पर पूर्णत: स्थिर हुए, वही दिन महाशिवरात्रि के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।



















