नंदनी माता शिखर प्रतिष्ठा महोत्सव में 11 हजार गंगाजल कलश, 35 हजार श्रद्धालुओं का ऐतिहासिक संगम

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11,000 Ganga water pitchers at the Nandini Mata Shikhar Pratishtha festival.
11,000 Ganga water pitchers at the Nandini Mata Shikhar Pratishtha festival.

बडोदिया। “मानो तो मैं गंगा मां हूं, ना मानो तो बहता पानी…”यह कोई पंक्ति मात्र नहीं रही, बल्कि वागड़ की धरती पर जीवंत हो उठा वह भाव, जिसने नंदनी माता धाम की 1500 फीट ऊंची पहाड़ी को श्रद्धा, सेवा और समर्पण के महाकुंभ में बदल दिया।

फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी की वह सुबह साधारण नहीं थी। प्रातः सात बजे से ही पहाड़ी की ओर बढ़ता श्रद्धालुओं का सैलाब यह संकेत दे रहा था कि आज कुछ असाधारण घटने वाला है। मां गंगा के पावन जल से भरे कलश, सिर पर श्रद्धा और होठों पर भक्ति—हर कदम पर आस्था बोल रही थी।

दो दिशाएं, एक श्रद्धा :

प्रातः 11 बजे वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ चौखला और चिरोला—दोनों दिशाओं से गंगाजल कलश पूजन प्रारंभ हुआ। चौखला की ओर से पूजन विट्ठल पाटीदार (पुत्र प्रेमजी पाटीदार) ने सम्पन्न कराया, जबकि चिरोला की ओर से हमीरपुरा सरपंच राकेश रावत और भूपेश पटेल ने कलश यात्रा को विधिवत शुभारंभ कराया। मिट्टी के कलशों में गंगाजल, ऊपर श्रीफल, चुनरी और अष्टगंध से अंकित “जय मातादी”—यह केवल पूजन सामग्री नहीं थी, यह विश्वास का भार था जिसे मातृशक्ति ने सिर पर धारण किया।

378 सीढ़ियां और भक्ति की परीक्षा :

बडोदिया–चिरोला हाईवे से लगभग दो किलोमीटर पैदल चलकर जब श्रद्धालु 378 सीढ़ियों के सामने पहुंचे, तब न थकान थी, न शिकायत। आठ वर्ष की गीता, पायल, मोनिका और 80–85 वर्ष की गंगा बाई, केसर बाई, धुली बाई—सबकी जुबान पर एक ही स्वर गूंज रहा था—
“प्रेम से बोलो जय माता दी…” ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कोई अदृश्य शक्ति स्वयं भक्तों को नीचे से ऊपर तक उठा रही हो। सिर पर कलश, आंखों में आंसू और चेहरे पर तेज—यह दृश्य शब्दों से परे था।

सेवा ही व्यवस्था बनी :

जहां जनसैलाब होता है, वहां अव्यवस्था का भय होता है—लेकिन नंदनी माता धाम पर सेवा ने व्यवस्था का रूप ले लिया। तरुण ज्वैलर्स की ओर से पेयजल व्यवस्था रही, तो मोगी देवी बुनकर धर्मपत्नी कालुजी बुनकर परिवार श्रद्धालुओं को गन्ने का रस पिलाते नजर आए।
पूरे पहाड़ी मार्ग पर नारियल और पूजन सामग्री की दुकानों से पहली बार मेला-सा वातावरण बन गया। वर्षों से शांत रहने वाली यह पहाड़ी पहली बार जीवंत हो उठी।

न भूतो न भविष्यति : वागड़ ने लिखी नई इबारत:

समिति अध्यक्ष जितेंद्र पाटीदार और जगदीश पाटीदार के शब्दों में— “यह पहाड़ी कुछ वर्ष पहले तक निर्जन थी, जल का अभाव था। आज यहां जनमैदिनी उमड़ पड़ी।” इतिहास में पहली बार 11 हजार गंगाजल कलश लेकर मातृशक्ति शिखर तक पहुंची। 35 हजार से अधिक श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने यह सिद्ध कर दिया कि वागड़–मेवाड़ क्षेत्र में ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा गया।

500 युवाओं ने थामा अनुशासन का मोर्चा :

कुबेर पटेल और कमलेश बुनकर बताते हैं कि 500 से अधिक युवा केवल एक संकल्प के साथ तैनात थे— कोई भगदड़ नहीं, कोई धक्का नहीं, मातृशक्ति को कोई बाधा नहीं। कलशधारी श्रद्धालुओं को ही मुख्य मार्ग से चढ़ाई की अनुमति दी गई। बढ़ती भीड़ के बावजूद संयम और अनुशासन बना रहा—यह स्वयं में एक उपलब्धि थी।

गंगाजल से हरियाली का संकल्प :

कलशों में लाए गए गंगाजल से सबसे पहले पहाड़ी पर पल्लवित हो रहे वृक्षों और पौधों को सिंचित किया गया। समिति अध्यक्ष और मातृशक्ति ने यह संदेश दिया कि आस्था केवल पूजा नहीं, संरक्षण भी है। चौखला से आए कलशों के जल से नंदेश्वर महादेव का जलाभिषेक हुआ। शेष जल को टंकी में संग्रहित कर पेय उपयोग हेतु सुरक्षित किया गया।

51 कुंडीय महायज्ञ की दिव्य गूंज :

नंदनी माता शक्ति पीठ पर चल रहे शिखर प्रतिष्ठा महोत्सव के अंतर्गत 51 कुंडीय शतचंडी, गणेश याग एवं रुद्र भैरव याग के द्वितीय दिवस प्रातःकालीन वेला में षोडशोपचार विधान से पूजन हुआ। प्रधान आचार्य किशोर शुक्ला और सह आचार्य कपिल भाई शास्त्री के निर्देशन में शतचंडी पाठ, गणेश याग और प्रतिष्ठा कर्म संपन्न हुए।

पं. पंकज जोशी के मार्गदर्शन में जलाधिवास, धन्यादिवास, दिशु होम, भैरव याग, संध्या पूजन और महाआरती हुई। महाप्रसाद का आयोजन केवजी पाटीदार (पुत्र रतनजी पाटीदार), चौखला परिवार द्वारा किया गया। करीब 15 क्विंटल बूंदी दोपहर तक समाप्त हो गई और रसोइयों ने लगातार प्रसाद तैयार किया।

आस्था का उत्सव, इतिहास का क्षण

विवेकानंद महाराज, लक्ष्मीनारायण सेवा संस्था के पूर्व अध्यक्ष हिरालाल सुथार, प्रशासनिक अधिकारी, कलिंजरा सीआई योगेंद्र व्यास मय पुलिस दल, वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी और सैकड़ों सेवाभावी कार्यकर्ताओं की उपस्थिति ने आयोजन को गरिमा दी।

यह केवल एक आयोजन नहीं था

यह वागड़ की सामूहिक आस्था, संगठन और संस्कार का उत्सव था। नंदनी माता की पहाड़ी ने यह सिद्ध कर दिया कि जब श्रद्धा संगठित होती है, तो इतिहास अपने आप रच जाता है।

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