जयपुर। राजधानी के जंतर-मंतर स्थित 105 फीट ऊंचे सम्राट यंत्र पर बुधवार को आषाढ़ी पूर्णिमा के अवसर पर सूर्यास्त के समय पारंपरिक वायु परीक्षण किया गया। शास्त्रों के अनुसार किए गए इस परीक्षण के आधार पर ज्योतिषाचार्यों ने सावन और भाद्रपद में अच्छी वर्षा होने की संभावना जताई। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अन्य ज्योतिषीय योगों के प्रभाव से कुछ क्षेत्रों में खंडवृष्टि, कहीं अतिवृष्टि तथा कहीं सामान्य से कम वर्षा की स्थिति भी बन सकती है।
वायु परीक्षण से पहले जंतर-मंतर में विधिवत पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद ज्योतिषाचार्य ध्वज लेकर सम्राट यंत्र पर पहुंचे और सूर्यास्त के समय शाम 7:13 बजे ध्वज स्थापित कर वायु की दिशा का परीक्षण किया। परीक्षण के लिए सूर्यास्त से दो मिनट पहले और दो मिनट बाद के समय को आधार बनाया गया। इस दौरान शहर के वरिष्ठ विद्वान एवं ज्योतिषाचार्य उपस्थित रहे।
ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद शास्त्री ने बताया कि परीक्षण के दौरान अधिकांश समय हवा का प्रवाह पूर्व से पश्चिम की ओर रहा। कुछ समय के लिए हवा ईशान (उत्तर-पूर्व) से नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशा की ओर भी चली, लेकिन प्रमुख प्रवाह पूर्व से पश्चिम ही रहा। शास्त्रों के अनुसार इसे श्रेष्ठ वर्षा का संकेत माना जाता है, जिससे सावन और भाद्रपद में अच्छी बारिश की संभावना व्यक्त की जाती है।
उन्होंने बताया कि वर्षा का आकलन केवल वायु परीक्षण के आधार पर नहीं किया जाता। कार्तिक मास से प्रारंभ होने वाले गर्भाधान काल सहित अनेक ज्योतिषीय योगों का भी अध्ययन किया जाता है। वर्तमान में कुछ अन्य योग मध्यम वर्षा की ओर संकेत कर रहे हैं, इसलिए प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा की स्थिति अलग-अलग रह सकती है। इसके बावजूद बुधवार का वायु परीक्षण अच्छी वर्षा के पक्ष में रहा।
पंडित विनोद शास्त्री ने बताया कि सम्राट यंत्र शहर का सबसे ऊंचा बिंदु होने के कारण यहां वायु का सबसे सटीक परीक्षण माना जाता है। प्राचीन काल से विद्वान इसी स्थान पर शास्त्रार्थ करते थे और मौसम संबंधी आकलन भी यहीं से किए जाते रहे हैं।
ज्योतिषाचार्य पंडित भास्कर शर्मा ने बताया कि जंतर-मंतर का निर्माण महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने कराया था, जो स्वयं भी खगोल एवं ज्योतिष के विद्वान थे। उन्होंने देश में पांच वेधशालाओं का निर्माण कराया, जिनमें जयपुर का सम्राट यंत्र सबसे ऊंचा है। यह यंत्र उनके गुरु जगन्नाथ सम्राट के नाम पर स्थापित किया गया था।
उन्होंने बताया कि लगभग 27 मीटर की ऊंचाई पर वायु का प्रवाह बिना किसी अवरोध के मिलता है। इसी कारण आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन सूर्यास्त के समय यहां वायु परीक्षण की परंपरा निभाई जाती है। इस पारंपरिक आकलन के आधार पर जयपुर तथा इसके लगभग 100 किलोमीटर के दायरे के लिए वर्षा का पूर्वानुमान लगाया जाता है। इस वर्ष के परीक्षण में भी अच्छी वर्षा के संकेत प्राप्त हुए हैं।



















