जयपुर। कांवड़ यात्रा के आध्यात्मिक, अनुभूति-आधारित एवं आत्मचिंतन से जुड़े अनुभवों को शब्दों में पिरोती लेखक सतीश गौतम की पुस्तक “भव सागर में तरण को” का विमोचन गुरुवार को राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति, झालाना के सभागार में सम्पन्न हुआ।
इस कार्यक्रम का आयोजन ग्रासरूट मीडिया फाउंडेशन द्वारा किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ रंगकर्मी गोपाल आचार्य उपस्थित रहे, जबकि अध्यक्षता संत योगी श्री रमणनाथ ने की।
कार्यक्रम की शुरुआत भाल भूषण द्वारा बांसुरी पर प्रस्तुत भजन “मैली चादर ओढ़ के” से हुई, जिसने पूरे वातावरण को आध्यात्मिकता और भावपूर्ण ऊर्जा से सराबोर कर दिया।
अपने संबोधन में गोपाल आचार्य ने कहा कि कांवड़ यात्रा केवल बाहरी यात्रा नहीं, बल्कि एक गहन आंतरिक यात्रा भी है। उन्होंने कहा, “सबसे बड़ी यात्रा सांस की है,” और सच्ची कृति वही होती है जो पाठक को अपने साथ यात्रा पर ले जाए। उन्होंने यह भी कहा कि “प्रदर्शन से पहले दर्शन जरूरी है,” अर्थात अनुभव की गहराई ही किसी रचना को सार्थक बनाती है।
लेखक सतीश गौतम ने अपने विचार व्यक्त करते हुए बताया कि उन्होंने किशोरावस्था से कांवड़ यात्रा प्रारंभ की और लगभग 8000 किलोमीटर की यात्रा के अनुभवों को इस पुस्तक में संजोया है। उन्होंने इसे ऐसी अनुभूति बताया, जिसे पूरी तरह शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता, बल्कि महसूस किया जा सकता है।
उन्होंने यह भी बताया कि व्यक्तिगत जीवन के गहरे अनुभव, विशेषकर पत्नी कुसुमलता के निधन के बाद, इस कृति का प्रकाशन उनके लिए एक भावनात्मक और आत्मिक पड़ाव रहा। उनके अनुसार, “जहां प्रयोजन समाप्त होता है, वहीं सौंदर्य प्रारंभ होता है।”
कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों, साहित्य प्रेमियों एवं बुद्धिजीवियों ने पुस्तक को आत्मचिंतन, आध्यात्मिक जागरूकता एवं जीवन के गहरे अर्थों को समझने वाली प्रेरणादायक कृति बताया तथा इसके व्यापक प्रसार की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम में राव शिवपाल सिंह,किशन प्रणय,पुष्कर उपाध्याय, अनिल लोढ़ा,महेश चंद्र शर्मा,अनुज शर्मा,राजेश मेथी,गोपाल शर्मा प्रभाकर,अंकित तिवारी उपस्थित रहे। अंत में प्रमोद शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापित किया।




















