आदित्य ज्योतिष शोध संस्थान एवं श्रीमद्भागवत सेवा समिति के तत्वावधान में 24वें वार्षिक उत्सव के रूप में श्रीमद्भागवत कथा श्री आचार्य जैनेंद्र कटारा व्यासपीठासीन के सानिध्य में प्रारंभ हुई। कथा से पूर्व भव्य शोभायात्रा संस्थान से प्रारंभ हुई, जिसमें लगभग 500 महिलाये एक सी साड़ी पहने हुए, अपने सिर पर कलश – श्रीफल धारण किये हुए भजन कीर्तन गाते हुए चल रही थी, कृष्ण-राधा के दिव्य स्वरूप की झांकी रथ में सवार थीं। कलश यात्रा आजाद नगर, गोविंद नगर, तुलसी नगर, बैरवा कॉलोनी रोड़ से होते हुए टोंक रोड़ से आजाद नगर स्थित भागवत धाम में प्रवेश किया। कलश यात्रा के समय जगह-जगह पर स्थानिय भक्तों ने भागवतजी की पोथी की आरती उतारी एवं पुष्प वर्षा करी। कथा प्रारंभ से पूर्व उपस्थित सभी श्रोता भक्तजनों ने सामुहिक हनुमान चालीसा का पाठ किया।
व्यासपीठासीन आचार्य जैनेंद्र कटारा ने श्रीमद्भागवत कथा के महात्यम का वर्णन करते हुए कथा श्रवण की विधि के बारे में बताया। श्रीमद्भागवत जी की उत्पति एवं पार्वती जी द्वारा अमरकथा को सुनना, राधाजी का शुक की श्राप आदि का वर्णन करते हुए, कुंती माँ द्वारा भगवान श्री कृष्ण से अद्भुत मांग ,विपदा को मांगने का मार्मिक वर्णन किया। राजा परीक्षित-कलयुग संवाद के मध्य कलयुग के शरणागति होने पर पाँच स्थान में जगह देने पर ,राजा परीक्षित द्वारा जरासंध का स्वर्ण मुकट धारण करना एवं मृगया को जाना, ऋषि पुत्र का श्राप एवं श्रीमद्भागवत कथा से शुक देव मुनि द्वारा राजा परीक्षित का उद्धार करने की कथा एवं आत्मदेव- धुंधली की कथा में गोकर्ण द्वारा धुंधकारी का भागवत कथा से उद्धार का वर्णन कर श्रीमद्भागवत जी के महत्व की सटीक जानकारी दी। वराह भगवान द्वारा पृथ्वी की पुनः स्थापनाऔर हिरण्याक्ष वध के साथ कथा को विराम दिया।




















