किसानों की मेहनत, बाजार की मांग और पहचान बनता चौमूं का बेर

0
53

जयपुर/चौमूं। कभी स्थानीय बाजारों तक सीमित रहने वाला चौमूं क्षेत्र का बेर आज देश-विदेश में अपनी मिठास और गुणवत्ता के लिए पहचाना जा रहा है। चौमूं की मिट्टी, जलवायु और किसानों की मेहनत ने इस छोटे से फल को बड़ा मुकाम दिलाया है। आज यहां हर साल बेर की खेती से करोड़ों रुपए का कारोबार हो रहा है।

चौमूं क्षेत्र में करीब 350 हेक्टेयर भूमि में बेर की खेती होती है। सीजन के दौरान यहां से लगभग 1,075 टन बेर उत्पादन होता है, जो सीधे किसानों की आमदनी को मजबूती देता है। चौमूं का बेर न केवल राजस्थान बल्कि दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश, हरिद्वार, नीमच, अलवर और बेंगलुरु जैसे बड़े बाजारों तक नियमित रूप से भेजा जा रहा है।

गांव-गांव में फैली खेती

आलीसर, सामोद, कुशलपुरा, फतेहपुरा, विजयसिंहपुरा, इटावा, हाड़ौता, नांगल भरड़ा, अमरपुरा, तिगरिया और निवाणा जैसे गांवों में बेर की खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है। इन गांवों के किसान पारंपरिक अनुभव के साथ आधुनिक तकनीक को अपनाकर बेहतर गुणवत्ता का उत्पादन कर रहे हैं।

विदेशी बाजारों तक पहुंच

चौमूं का बेर अब देश की सीमाओं से बाहर भी पहचान बना चुका है। फ्रांस, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, इंग्लैंड और पोलैंड जैसे देशों में भी यहां का बेर निर्यात किया जा रहा है। निर्यात से किसानों को बेहतर दाम मिल रहे हैं, जिससे बेर की खेती लाभ का सौदा साबित हो रही है।

किसानों की आर्थिक रीढ़

बेर की खेती ने चौमूं क्षेत्र में किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है। कम लागत और बेहतर उत्पादन के कारण यह खेती छोटे किसानों के लिए भी लाभकारी बनी है। स्थानीय किसानों का कहना है कि बेर ने उन्हें रोजगार, सम्मान और स्थायित्व दिया है।

पहचान बनता चौमूं

आज चौमूं का नाम लेते ही बेर की मिठास स्वतः याद आ जाती है। यह केवल एक फसल नहीं, बल्कि किसानों की मेहनत, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और राजस्थान की कृषि क्षमता का प्रतीक बन चुका है।

बांसा फतेहपुरा निवासी किसान पुरण सैनी ने बताया कि बेर की खेती ने किसानों को आत्मनिर्भर बनाया है। उनका कहना है कि पहले पारंपरिक फसलों में लागत अधिक और जोखिम ज्यादा रहता था, लेकिन बेर की खेती में कम पानी और कम खर्च में अच्छा उत्पादन मिलता है। बाजार में इसकी मांग लगातार बनी रहती है और अब गांव का उत्पाद विदेशों तक जा रहा है। इससे किसानों को स्थायी आमदनी मिली है और गांव के युवाओं को भी रोजगार के अवसर उपलब्ध हुए हैं।

बांसा निवासी किसान नीलम सैनी ने बताया कि इस सीजन में बेर का थोक रेट गुणवत्ता और साइज के अनुसार तय हो रहा है। उन्होंने बताया कि मोटा बेर थोक में प्रति किलो 20 से 25 दाने,चमेली किस्म का बेर 25 से 30 दाने प्रति किलो के भाव में बिक रहा है। वहीं सामान्य बाजार दर की बात करें तो मोटा बेर 35 से 40 दाने प्रति किलो, जबकि चमेली बेर 40 से 45 दाने प्रति किलो की दर से बिक रहा है।

नीलम सैनी के अनुसार एक बड़े और विकसित बेर के पेड़ से 500 किलो तक उत्पादन प्राप्त हो जाता है। वहीं अच्छी क्वालिटी और साइज के कारण चौमूं क्षेत्र के बेरों को मंडियों में तुरंत खरीदार मिल जाते हैं। इस बार मौसम अनुकूल रहने से उत्पादन भी बेहतर हुआ है, जिससे किसानों को संतोषजनक दाम मिल रहे हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here