जवाहर कला केन्द्र में आयोजित तीन दिवसीय उत्सव का समापन

जयपुर। रंगमंच, साहित्य और संगीत की सुगंध से सराबोर करने के साथ जवाहर कला केन्द्र की ओर से आयोजित तीन दिवसीय वागेश्वरी महोत्सव का रविवार को समापन हुआ। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य पर महोत्सव का आयोजन किया गया। अंतिम दिन राजस्थानी लघु चित्रण परंपरा और संरक्षण विषय पर संवाद हुआ, प्रो. सुनीता तिवारी नागपाल के निर्देशन में नाटक स्वान सौंग का मंचन किया गया। वहीं वरिष्ठ शास्त्रीय गायिका मैत्रेयी मजूमदार ने भिन्न-भिन्न रागों में सुरीली प्रस्तुति से समां बांधा। वागेश्वरी के अंतर्गत आयोजित महिला चित्रकार शिविर 12 मार्च तक जारी रहेगा। इसमें प्रदेश की 10 ख्यातनाम महिला चित्रकार अपनी पेंटिंग्स बनाएंगी, प्रदर्शनी में यह आर्टवर्क देखने को मिलेगा।

राजस्थानी लघु चित्रण परंपरा और संरक्षण विषय पर संवाद करने के लिए वरिष्ठ कलाकार समदर सिंह खंगारोत ‘सागर’, रामू रामदेव, डॉ. रीता प्रताप और डॉ. तनुजा सिंह ने मंच साझा किया। सभी विशेषज्ञों ने एकमत होकर यह राय रखी की दुनियाभर में राजस्थान की लघु चित्रण ने पहचान बनायी है। युवा पीढ़ी को इस विधा से अवगत कराने के लिए स्कूली पाठ्यक्रम में इसे शामिल किया जाना आवश्यक है। डॉ. रीता अग्रवाल ने लघु चित्रण परंपरा के इतिहास पर प्रकाश डाला। समदर सिंह खंगारोत ने कहा कि लघु चित्रण इतना कठिन नहीं है जितना कहा जाता है जरूरत है तो रूचि पैदा करने की। उन्होंने बताया कि राजस्थानी चित्रण परंपरा में महिला पात्रों की महती भूमिका है। रागमाला भी बिना महिला पात्रों के कभी पूरी नहीं हो सकती। डॉ. रीता प्रताप ने बताया कि वर्तमान में लघु चित्रण परंपरा के विषय बदल रहे हैं।

इधर कृष्णायन में प्रो. सुनीता तिवारी नागपाल के निर्देशन में नाटक द स्वान सॉन्ग का मंचन किया गया। मशहूर लेखक व शायर गुलज़ार साहब की तीन कहानियों को बड़े प्रभावी ढंग से मंच पर साकार किया गया। इन कहानियों में सीमा, रावी पार और काग़ज़ की टोपी शामिल है। पहली कहानी, ‘सीमा, सुधीर और डी के’ तीन किरदारों के मध्य घूमती और उनके आपसी रिश्तों के उधेड़बुन को दर्शाती। यह उनके अस्तित्व की तलाश की एक बेहद संजीदा कहानी है। वहीं दूसरी कहानी में बटवारे के दर्द को बयां किया गया। दर्शन सिंह और साहनी के पात्र के जरिए दर्शाया गया कि बटवारे में सभी ने कुछ ना कुछ खोया, सिर्फ़ परिवार नहीं बिखरे बल्कि विश्वासों का भी खून हुआ, हँसते–खेलते घर मातम का समुन्दर हो गए। तीसरी कहानी में दो प्रेमियों की दास्तान को बयां किया गया। सुनीता नागपाल, सऊद नियाज़ी, पुलकित शर्मा और कृष्ण पाल नरुका ने विभिन्न किरदार निभाये।

वरिष्ठ शास्त्रीय गायिका मैत्रेयी मजूमदार ने विभिन्न शास्त्रीय रचनाएं पेश कर समां बांधा। सुर साधने के बाद राग श्याम कल्याण में बंदिश, ‘जियो मोरे लाल’ से शुरुआत हुई। द्रुत लय में बंदिश ‘सावन की सांझ’ के बार राग बागेश्वरी में मध्य लय तीन ताल में रचना ‘गरवा लागो री’ पेश की गयी। रामपुर सहसवान घराने का तराना पेश करने के बाद उन्होंने चैती, ‘चेत्र मास बोलेली कोयलिया ओ रामा मोरे अंगनिया’ के साथ समापन किया। तबले पर मोहित कथक तानपुरे पर रमेश चंद्र बुनकर और डॉ रचना पारीक व हारमोनियम पर राजन खींचीं ने संगत की।

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