जयपुर/जैसलमेर। जैसलमेर की पावन धरा पर आयोजित तीन दिवसीय दादागुरुदेव जिनदत्त सूरि चादर महोत्सव आस्था, आध्यात्म और सामाजिक समरसता का अद्भुत उदाहरण बनकर ऐतिहासिक रूप से संपन्न हुआ। गच्छाधिपति पूज्य आचार्य जिनमणिप्रभ सूरि की पावन निश्रा में आयोजित इस विराट आयोजन ने जैन समाज के साथ व्यापक समाज को भी एकता, श्रद्धा और सांस्कृतिक समन्वय का संदेश दिया।
महोत्सव के शुभारंभ अवसर पर मोहन भागवत की उपस्थिति को जैन और हिंदू संत परंपराओं के मिलन के रूप में देखा गया। उन्होंने अपने संदेश में दादागुरु परंपरा को भारतीय संस्कृति की एकात्मता, समरसता और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक बताते हुए समाज में आपसी सद्भाव और एकता को मजबूत करने का आह्वान किया।
तीन दिनों तक चले इस महोत्सव में देश के विभिन्न राज्यों सहित विदेशों से भी हजारों श्रद्धालु जैसलमेर पहुंचे। जैन संतों, साधु-साध्वियों तथा हिंदू संत-महात्माओं की उपस्थिति ने आयोजन को आध्यात्मिक संगम का स्वरूप प्रदान किया। श्वेतांबर परंपरा, खरतरगच्छ और ओसवाल समाज के श्रद्धालुओं की व्यापक सहभागिता ने समाज की एकजुटता और दादागुरु के प्रति अटूट आस्था को प्रकट किया।
महोत्सव का सबसे ऐतिहासिक क्षण तब आया जब लगभग 150 वर्षों बाद सोनार किला स्थित ज्ञान भंडार से 871 वर्ष पुरानी दादागुरुदेव जिनदत्त सूरि की पवित्र चादर को श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ बाहर लाया गया। किले से निकला भव्य वरघोड़ा श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत दृश्य बन गया, जिसमें हाथी, घोड़े, ऊँट, लोक कलाकारों की झांकियाँ और नासिक ढोल की धुनों के बीच हजारों श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर पवित्र चादर का स्वागत किया।




















