जयपुर। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन को सवा दो साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद कई महत्वपूर्ण बोर्ड और आयोग अब भी अध्यक्षों के बिना संचालित हो रहे हैं। दीपावली के बाद नियुक्तियों की आस लगाए बैठे नेताओं को अब होली के बाद भी निराशा हाथ लगी है। जिससे सियासी हलकों में हलचल तेज हो गई है और जयपुर से दिल्ली तक लॉबिंग का दौर बढ़ गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार निकाय और पंचायत चुनावों की अनिश्चितता नियुक्तियों में देरी की प्रमुख वजह मानी जा रही है। माना जा रहा है कि जैसे ही इन चुनावों की स्थिति स्पष्ट होगी, सरकार बड़े पैमाने पर राजनीतिक नियुक्तियों का फैसला ले सकती है। तब तक इंतजार और अटकलों का दौर जारी रहने की संभावना है।
प्रदेश में संगठन पर्व के बाद नई कार्यकारिणी का गठन हो चुका है। हालांकि मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाएं फिलहाल ठंडी पड़ गई हैं, लेकिन बोर्ड-आयोगों में नियुक्तियों को लेकर उम्मीद बनी हुई है। इन नियुक्तियों को संगठन और सत्ता के बीच संतुलन साधने का अहम माध्यम माना जाता है, जिसमें चुनाव हारे नेता, टिकट से वंचित दिग्गज और मंत्रिमंडल में जगह नहीं पाने वाले विधायकों को समायोजित किया जाता है।
कई अहम संस्थानों में पद रिक्त
प्रदेश के महिला आयोग, बाल आयोग, समाज कल्याण सलाहकार बोर्ड, अल्पसंख्यक आयोग, वक्फ बोर्ड, ओबीसी आयोग, राज्य खेल परिषद, खादी बोर्ड, राज्य बीज निगम, आवासन मंडल, राज्य हज कमेटी, डांग और मगरा विकास बोर्ड सहित कई संस्थानों में नियुक्तियां लंबित हैं।
गुटबाजी से बचने के लिए टाल रही सरकार
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि वर्तमान समय में बड़े पैमाने पर नियुक्तियां की जाती हैं, तो इससे गुटबाजी खुलकर सामने आ सकती है। ऐसे में सरकार संतुलन बनाए रखने के लिए फिलहाल नियुक्तियों को टालने की रणनीति अपना रही है।
दिग्गजों के नाम चर्चा में
सूत्रों के अनुसार, संभावित नामों पर मंथन लगभग पूरा हो चुका है और आने वाले दो-तीन महीनों में नियुक्तियों पर मुहर लग सकती है। पूर्व मंत्री राजेंद्र राठौड़, प्रभुलाल सैनी, श्रीचंद कृपलानी, रामलाल शर्मा, निर्मल कुमावत, विठ्ठल शंकर अवस्थी, ज्योति मिर्धा, श्रवण बगड़ी, नारायण पंचारिया, सरदार अजयपाल सिंह, चंद्रकांता मेघवाल और संतोष अहलावत सहित कई नेताओं के नाम चर्चा में हैं।
विपक्ष ने साधा निशाना
विपक्ष ने नियुक्तियों में देरी को मुद्दा बनाते हुए सरकार पर निशाना साधा है। विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार के पास स्पष्ट नीति और समयबद्ध योजना का अभाव है, जिससे प्रशासनिक कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
वहीं सत्तापक्ष का कहना है कि नियुक्तियों में देरी किसी विवाद के कारण नहीं, बल्कि तय प्रक्रिया के तहत हो रही है। सभी स्तरों पर विचार-विमर्श के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाता है, जिसके चलते समय लगना स्वाभाविक है।




















