जयपुर के मणिहारों का रास्ता में सजे गुलाल गोटा

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Gulal Gota decorated in the path of jewelers of Jaipur
Gulal Gota decorated in the path of jewelers of Jaipur

जयपुर। राजधानी जयपुर की पुरानी गलियों में होली की रंगत साफ नजर आ रही है। खासतौर पर मणिहारों का रास्ते में पारंपरिक गुलाल गोटा बनाने में जुटे कारीगरों की वजह से गुलजार है। यहां के 79 वर्षीय माहिर कारीगर आवाज़ मोहम्मद अपनी कला से इस विरासत को जीवित रखे हुए हैं।

लाख के उत्कृष्ट कार्य के लिए आवाज मोहम्मद को राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। होली के मौसम में वे चूड़ियों का काम छोड़कर गुलाल गोटा बनाने में व्यस्त हो जाते हैं। जयपुर में होली बिना गुलाल गोटा के अधूरी मानी जाती है।

गुलाल गोटा बनाने की प्रक्रिया बेहद रोचक है। पहले लाख को कोयले की आग पर गर्म किया जाता है, फिर उसे गोल आकार देकर उसमें फूंक मारकर लगभग पांच ग्राम वजन के खोखले गोले तैयार किए जाते हैं। इन्हें पानी से भरे ड्रम में ठंडा किया जाता है। इसके बाद इनमें एरोरूट पाउडर से बना सुगंधित गुलाल भरकर सावधानी से सील कर दिया जाता है। लाल, गुलाबी, पीले, हरे और नारंगी रंगों से सजे ये गोले होली पर खुशियां बांटते हैं।

इस परंपरा का संबंध जयपुर के शाही इतिहास से भी जुड़ा है। सबसे पहले गुलाल गोटा भगवान कृष्ण को अर्पित कर वृंदावन भेजा जाता है, इसके बाद सिटी पैलेस जयपुर की शाही होली के लिए विशेष डिब्बे तैयार किए जाते हैं। पहले इन्हें राजघरानों और ठिकानों में भेजा जाता था।

मणिहारों का रास्ता के कारीगर शब्बीर मोहम्मद ने बताया कि उनका परिवार नौ पीढ़ियों से लाख की चूड़ियां और गुलाल गोटा बना रहा है। वे अपने पोते को भी यह हुनर सिखा रहे हैं। जनवरी से मार्च तक तीन महीने गुलाल गोटा तैयार किया जाता है, इसके बाद कारीगर फिर चूड़ियां और लाख के आभूषण बनाने लगते हैं।

कभी लुप्त होती यह कला अब सोशल मीडिया के कारण नई पहचान पा रही है। पर्यटकों की रील्स के चलते दिल्ली और अहमदाबाद जैसे शहरों से भी ऑर्डर मिलने लगे हैं। रंग, परंपरा और मेहनत से सजी यह गली आज जयपुर की सांस्कृतिक विरासत को नई चमक दे रही है।

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