कंबोडिया, नेपाल और बांग्लादेश के मरीजों को जारी की बड़ी संख्या में एनओसी

जयपुर। सवाई मान सिंह हॉस्पिटल में रुपए लेकर अंग प्रत्यारोपण (ऑर्गन ट्रांसप्लांट) की फर्जी एनओसी देने के मामले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने मंगलवार को फोर्टिस अस्पताल में छापा मारा। एसीबी ने वहां पर बड़ी संख्या में संदिग्ध फाइलें जब्त की है। एसीबी ने अस्पताल के ट्रांसप्लाट कोर्डिनेटर विनोद की फाइलों को जब्त किया है। इन फाइलों में कई संदिग्ध केस मिले है। एसीबी इन संदिग्ध फाइलों की जांच कर रही है।


एसीबी के डीआईजी डॉ. रवि ने बताया कि प्रदेश में ऑर्गन ट्रांसप्लांट के लिए 12 अस्पताल को ही परमिशन है। इस लिस्ट में मुम्बई के अस्पताल में शामिल है। करीब सवा तीन साल में 1000 से ज्यादा एनओसी जारी की गई। इनमें से कितने केस सही है या नहीं, इसकी जांच की जा रही है। एसएमएस से अरेस्ट गौरव के घर से एनओसी की जो फाइलें जब्त की है,उनमें से 40 प्रतिशत केस विदेशी मरीजों के है। ये सभी एनओसी कम्बोडिया, बांग्लादेश और नेपाल के मरीज की है। इनमें कुछ फाइलें कम्पलीट है तो कुछ खाली मिली है। इन मामलों में कितने रुपयों का लेन-देन हुआ , इसकी जांच की जा रही है। मामले में पकड़े गए दोनों आरोपियों से पूछताछ की जा रही है। एसीबी ने मंगलवार को सवाई मानसिंह अस्पताल में सर्च किया और अंग प्रत्यारोपण का रिकॉर्ड वाले कार्यालय को सीज कर दिया गया। इसमें कई पुरानी फाइलें मिली है। इन सभी फाइलों की जांच की जाएगी। कितनी गलत है और कितनी सही है।


डॉ रवि ने बताया कि अंग प्रत्यारोपण मामले में अरेस्ट लोग कोई रैकेट नहीं चला रहे है। यह एक नार्मल प्रक्रिया है। मेडिकल ट्यूरिज्म में राजस्थान आगे बढ़ रहा है। मेडिकल सुविधाएं राजस्थान में अच्छी है। बाहर से लोग इलाज करवाने देश में आते है। जयपुर में भी बड़ी संख्या में लोग आते है। गौरव के घर से एनओसी जब्त की है उनमें से खाली या पूरी भरी हुई उनमें 40 प्रतिशत विदेशी है। अंग प्रत्यारोपण के मामले में डॉर्नर जेनुइन है या नहीं इसकी अभी तक जांच हमारें स्तर पर नहीं की गई है। अंग प्रत्यारोपण और फर्जी एनओसी जारी करने के बाद निचले स्तर से ऊपरी स्तर के कर्मचारी हो या अधिकारी अगर किसी की संलिप्तता पाई जाती है तो किसी को बख्शा नहीं जाएगा।


एसएमएस अस्पताल के सीनियर डॉक्टर्स की सूचना पर ही की थी कार्रवाई

डीआईजी डॉ. रवि ने इस मामले के खुलासे में एसएमएस अस्पताल प्रशासन ने पूरी मदद की है। इस पूरे मामले की जानकारी एसएमएस अस्पताल प्रशासन से ही मिली थी। इसकी जांच के लिए संदिग्ध पर निगरानी रखी गई और फिर सूचना के पुख्ता होने पर ही इस कार्रवाई को अंजाम दिया गया है। इस मामले में गठित डॉक्टर्स की कमेटी भी संदेह के घेरे में है। खास बात यह है कि पिछले करीब सालभर से ऑर्गन ट्रांसप्लांट के लिए बनाई गई डॉक्टरों की कमेटी की एक भी बैठक नहीं हुई है। यही कमेटी है, जो ऑर्गन ट्रांसप्लांट करने के लिए एनओसी जारी करती है। ऐसे में कमेटी में शामिल सभी डॉक्टर्स या मेंबर संदेह के घेरे में है।

बिना बैठक के ही बड़ी संख्या में अंग प्रत्यारोपण की एनओसी जारी कर दी गई। इस कमेटी की अधिकृत मीटिंग के बिना ही रैकेट में शामिल लोग एनओसी जारी कर देते थे। इस पूरे मामले में उच्च स्तर पर मेडिकल स्टाफ की मिलीभगत और अंगों की तस्करी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।


गौरतलब है कि एसीबी ने एसएमएस हॉस्पिटल में रविवार देर रात 1.30 बजे कार्रवाई कर फर्जी एनओसी देने वाले सहायक प्रशासनिक अधिकारी गौरव सिंह और ईएचसीसी हॉस्पिटल के ऑर्गन ट्रांसप्लांट को-ऑर्डिनेटर अनिल जोशी को लेनदेन करते रंगे हाथ पकड़ा। एसीबी ने मौके से 70 हजार रुपए और 3 फर्जी एनओसी लेटर भी जब्त किए हैं। एसीबी के अधिकारी गौरव सिंह और अनिल जोशी के घर और अन्य ठिकानों पर भी सर्च की। फोर्टिस हॉस्पिटल का को-ऑडिनेटर विनोद सिंह कुछ समय पहले पैसा देकर फर्जी सर्टिफिकेट लेकर गया है। एसीबी ने उसे भी गिरफ्तार कर लिया। सरकार ने ईएचसीसी हॉस्पिटल के ऑर्गन ट्रांसप्लांट का लाइसेंस सस्पेंड कर दिया है। जांच के दौरान गौरव सिंह के घर से 150 से अधिक सर्टिफिकेट मिले।

आरोपी के पास जो तीन सर्टिफिकेट मिले, वह तीनों नेपाल के लोगों के थे। ये लोग बाहर के लोगों से ऑर्गन की खरीद-फरोख्त कर रहे थे। करीब 35 सर्टिफिकेट तैयार थे, जिसे देना बाकी था। इन सभी सर्टिफिकेट के साथ-साथ एसीबी ने आरोपियों के लैपटॉप, हार्ड डिस्क और कुछ अन्य वस्तु जब्त कर ली हैं। एसीबी ने तीनों आरोपियों को कोर्ट में पेश कर चार दिन का रिमांड लिया है।


ट्रांसप्लांट को मंजूरी देने वाली कमेटी में ये लोग शामिल


एसएमएस मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. राजीव बगरहट्टा, ट्रॉमा सेंटर के इंचार्ज डॉ. अनुराग धाकड़, कार्डियक सर्जन डॉ. रामकुमार यादव, एसएमएस हॉस्पिटल के अधीक्षक डॉ. अचल शर्मा, एक-एक डॉक्टर नेफ्रोलॉजी और गेस्ट्रॉलोजी। इनके अलावा दो सामाजिक कार्यकर्ता जो अंगदान के क्षेत्र में काम करते हैं।


एसएमएस हॉस्पिटल के अधीक्षक और ऑर्गन ट्रांसप्लांट कमेटी के सदस्य डॉ. अचल शर्मा के मुताबिक, ऐसे हॉस्पिटल जिनको ऑर्गन ट्रांसप्लांट का अप्रूवल है। उसमें ऑर्गन ट्रांसप्लांट के केसों के लिए सरकार कमेटी बनाती है। यह कमेटी एसएमएस हॉस्पिटल में है। कमेटी के पास जब कोई लीवर या किडनी ट्रांसप्लांट का केस आता है तो सबसे पहले डोनर और रिसीवर का ब्लड रिलेशन जांच करते हैं। अगर वह ब्लड रिलेशन में होता है तो दोनों (रिसीवर और डोनर) की मेडिकल जांच होती है और उसकी रिपोर्ट के आधार पर एनओसी जारी की जाती है।

इस प्रक्रिया में थोड़ा समय लगता है। अगर कोई ब्लड रिलेशन में व्यक्ति खास न होकर रिलेटिव है तो उस रिलेटिव की बैंक खातों की जांच भी करवाई जाती है, जो जिला प्रशासन की मदद से होती है। प्रशासन उसकी पूरी जांच करके हमें रिपोर्ट देता है, उसके बाद हम यहां से एनओसी जारी करते हैं। ये जांच इसलिए की जाती है, ताकि ये सुनिश्चित हो सके कि अंग का दान हुआ है न कि उसे बेचा गया है।

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