सिंजारे पर गणगौर के हाथों पर लगाई मेहंदी

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जयपुर। सुहाग पर्व गणगौर से पूर्व शुक्रवार को गणगौर का सिंजारा मनाया गया। सिंजारा पर्व पर रामगंज बाजार स्थित लाड़लीजी मंदिर में ठाकुरजी को ललित संप्रदायाचार्य महंत( डॉ.) संजय गोस्वामी के सान्निध्य में केसर, पिस्ता, बादाम युक्त मक्खन, रबड़ी, रबड़ी, आम, मेवा, फलों तथा विशेष व्यंजनों का भोग लगाया गया।

नव विवाहिताओं के पीहर से सिंजारा आया। सिंजारे में मिठाई, घेवर के साथ कपड़े आए। सुहागिन महिलाओं ने गणगौर पूजन के लिए हाथों पर मेहंदी लगाई और रुप संवारा। गणगौर के भी मेहंदी लगाई गई। साथ ही मिट्टी के ईसर और गणगौर की खरीदारी भी की। नवविवाहिताओं को उनके ससुराल से शृंगार सामग्री, कपड़े और घेवर आदि सिंजारे में आए। कई मंदिरों में भी सिंजारा महोत्सव मनाया गया।

शिव-पार्वती के अटूट प्रेम का प्रतीक है गणगौर पर्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता गवरजा (मां पार्वती) होली के दूसरे दिन अपने पीहर आती हैं और आठ दिनों के बाद भगवान शिव (ईसरजी) उन्हें वापस लेने के लिए आते हैं। फिर चैत्र शुक्ल तृतीया को उनकी विदाई होती है। होली के दूसरे दिन यानी कि चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं मिट्टी के शिवजी यानी गण एवं माता पार्वती यानी की गौर बनाकर प्रतिदिन पूजन करती हैं।

इन दिनों में महिलाएं रोज सुबह उठकर दूब और फूल चुनकर लाती हैं। उन दूबों से दूध और पानी के छींटे मिट्टी की बनी हुई गणगौर माता को देती हैं। फिर चैत्र शुक्ल द्वितीया के दिन किसी नदी, तालाब या सरोवर पर जाकर पूजी हुई गणगौरों को पानी पिलाती हैं यानी बिंदोरा निकालती है। चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया को शाम के समय उनका विसर्जन कर देती हैं।

गणगौरों के पूजा स्थल गणगौर का पीहर और विसर्जन स्थल ससुराल माना जाता है। गणगौर पूजन करने वाली महिलाओं के घरों में शुक्रवार को गुणे-शक्करपारे बनाए गए। सुहागिन महिलाएं 8 गुणे और कुंवारी कन्याएं 16 गुणे माता को अर्पित करेंगी। घेवर का भोग भी लगाया जाएगा।

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