अब राजस्थान सिनेमा बनाने को लेकर आगे बढ़ चुका है

जयपुर । हर पांच साल में राजस्थान को समर्पित विश्वप्रसिद्द जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टीवल जिफ का आयोजन जयपुर में चल रहा है. फेस्टीवल का आयोजन आयनॉक्स जी टी सेन्ट्रल और राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति, झालाना, जयपुर में हो रहा है. फिल्मों की स्क्रीनिंग 12PM  से 6PM तक रहेगी.  18 साल से कम उम्र के लोगों का प्रवेश निषेद रहेगा. इस बार राजस्थान से 20 फिल्मों की स्क्रीनिंग हो रही है.

तीसरी बार जिफ में आये आस्ट्रेलियन एक्टर  एंड्र्यू

12 फरवरी को मास्टर क्लास लेंगे ऑस्ट्रेलियन एक्टर एंड्रयू

एंड्रयू वियल बताते हैं कि जिफ में ये उनकी तीसरी विजिट है।वे एक डायरेक्टर और एक्टर हैं, अपनी ऐक्टिंग को लेकर काफ़ी पैशनेट हैं। उन्हें यही पैशन जयपुर और राजस्थान के युवाओं में दिखता है। पहली बार वे 2012 में जयपुर आये थे और जब से ही उन्हें जयपुर से एक कनेक्शन फील होता है।

जयपुर ही क्यों चुनने पर वे क़हते हैं कि जयपुर बेहद डायनामिक और वाइब्रेंट सिटी है। संस्कृति, कला की दृष्टि से भी इसका विशेष महत्व है।

वे क़हते है युवाओं को प्रोत्साहन और कॉन्फ़िंडेंस की ज़रूरत है। अगर उन्हें कोई ऐसा मिल जाये जो उन्हें उनकी क़ाबिलियत का यक़ीन दिला सके तो वे कुछ भी कर सकते हैं। वे क़हते हैं ऐक्टिंग और एंटरटेनमेंट पूरी दुनिया को जोड़ती है। उनकी पहली फ़िल्म को लेकर उन्हें होने वाली जो टेक्नोलॉजी परेशानी हुई उस पर वे क़हते हैं कि कैसे आज का टाइम टैकोलॉजिकल एडवांस्ड हो गया है।

अपने जिफ के अनुभव साझा करते हुए वे बताते हैं कि कैसे जिफ इंटरनेशनल फ़िल्मों को जगह देता है और विभिन्न भाषाओं के सिनेमा को बढ़ावा देता है, यह ख़ूबसूरती है।

वे दुनिया में अलग अलग देश घुम चुके हैं लेकिन उन्हें राजस्थान की ख़ूबसूरती अलग तरीक़े से आकर्षित करती है।

डिजिटल क्रिएटर और एक्टर में क्या फ़र्क़ है ? पूछने पर एंड्रयू क़हते हैं एक्टर होना बेहद अलग और मुश्क़िल बात है। एक एक्टर की पर्सनल लाइफ बिल्कुल न के बराबर होती है, एक एक्टर को ऐक्टिंग में जान डालने के लिए कभी कभी उसके अंदर चल रहे द्वन्दों और पर्सनल बिलीफ, दृष्टिकोण से लड़ना पड़ता है।

तेज़ी से बढ़ते डिजिटल क्रिएटर को यदि सही प्लेटफार्म दे दिया जाये तो वे ऐक्टिंग क्षेत्र में कमाल कर सकते हैं।

राजस्थान में भाषायी बैरियर को कैसे तोड़ेंगे पर बताते हैं कि अब भाषा उतना बड़ा बैरियर नहीं हैं जयपुर में भी अच्छी यूनिवर्सिटीज़ , स्कूल , कॉलेज हैं तो भाषा एक बैरियर न बनकर ब्रिज बनेगी जो कला और एक्टिंग से सबको जोड़ेगी।

 राजस्थानी सिनेमा: क्या फिर आएगा सुनहरा दौरपर चर्चा

जयपुर इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल का दूसरे दिन की शुरुआत फाउंडर हनु रोज , लव यु म्हारी जान राजस्थानी कमर्शियल  फिल्म  के डायरेक्टर मनोज़ कुमार पांडेय और राकेश गोगना के डायलॉग के साथ शुरू होती है। हनु रोज कहते हैं कि जिफ ऑर्गनाइज़र के तौर पर राजस्थान और राजस्थानी दोनों का उपयोग करता है।

जिफ़ का उद्देश्य नवाचार को बढ़ावा देना और राजस्थानीं फिल्मों को लेकर लोगो की मानसिकता को बदलना है। फिल्मों के लिए फ़ंड्स से ज़्यादा फैसिलिटीज़, इंफ़्रास्ट्रक्चर, लोकेशन की अधिक आवश्यकता है। वे जाने भी दो यारों को लेकर क़हते हैं कि फ़िल्म का टेक्नोलॉजी से कहीं अधिक मज़बूत भाग फ़िल्म की कहानी है। हनु क़हते हैं कि राजस्थानी को लेकर नेगेटिव डायलॉग बंद होने चाहिए।

फ़िल्म डायरेक्टर मनोज कुमार कहते हैं कि राजस्थान में मुंबई से भी अधिक फ़िल्म ऐक्टिविटिस होतीं हैं। वे क़हते है कि राजस्थान की जनसंख्या 8.5 करोड़ है, अगर एक एक रुपए लेकर भी फ़िल्म बनायी जाये तो भी एक अच्छी फ़िल्म बनायी जा सकती है। वे श्याम बैंगल का उदाहरण देते हैं जिन्होंने दो-दो रुपए जनता से लेकर “मंथन” फ़िल्म बनायी थी।

टूरिंग- टॉकिंग सिनेमा को बताते हुए मनोज बताते हैं कि कैसे छतीसगढ़ में डेढ़ करोड़ जनसंख्या वाले क्षेत्र से साढ़े तीन करोड़ का कारोबार किया गया। राजस्थान में भी इसे अपनाना चाहिए।

फ़िल्म डायरेक्टर राकेश गोगना बताते हैं कि कैसे राजस्थान में राजस्थानी बोलने वालों को कम पढ़ा लिखा आंका जाता है। एक बड़े बदलाव और भाषायी अपनाव की ज़रूरत है। वे दादा साहेब फाल्के के आंदोलन और भाषायी सिनेमा के क्रेज़ की बात बताते हैं की कैसे असमी, बंगाली, उड़िया सिनेमा बढ़ रहे हैं और हरियाणवी सिनेमा को तो ओटीटी पर भी अच्छा रिस्पांस मिल रहा है।

इस ओपन डायलॉग में प्रतिभागियों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया. राजस्थान से पहली बार बड़ी संख्या में हो रही फिल्म स्क्रीनिंग ही इस बात का तथ्य है की अब राजस्थान आगे बढ़ चुका है. राजस्थान के लोगों ने बड़ी संख्या में फ़िल्में बनाई है वो फिर से राजस्थानी और राजस्थान के सिनेमा नए युग की शुरुआत के संकेत हैं. राजस्थानी सिनेमा: क्या फिर आएगा सुनहरा दौर? ये एक अब उम्मीद ही नहीं हकीकत है.

इस हकीकत को आज के फिल्मकार सही साबित करने में जुट चुके हैं. सरकार को अनुदान के साथ साथ सुविधाएं उपलब्ध करनी चाहिए जैसे अन्य राज्यों में है. गुजरात की तरह स्पष्ट और सिंपल फिल्म पॉलिसी होनी चाहिए. सरकार को पुराणी फिल्म पॉलिसी की जगह नई फिल्म पॉलिसी फिर से बनानी होगी. पुराणी पॉलिसी में कई खामियां है और ये अस्पष्ट है.

10 फरवरी दिखाई गई फिल्में –

पुष्कर फेयर, वाटर एन्ड फायर, 5 सीजंस – ए जर्नी, वाट रियली हैपेंड, चाह, कन्ने कलैमाने, क्रोज आर वाईट, और बासन

11 फरवरी को दिखाई जाने वाली फ़िल्में –

11 फरवरी को लव यू महरी जान, जीवन की खोज, तेरा रूप, मंदिर, मस्जिद और भारत का विकास, डर के आगे जीतू है, ड्यूटी, वीरा, खीर और बहना की स्क्रीनिंग होगी.

11 फरवरी को

एआई और सिनेमा उद्योग: चुनौतियाँ विषय पर ओपन डायलॉग होगा.

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