जयपुर। मीन संक्रांति के साथ 14 मार्च से खरमास शुरू हो जाएगा। यह अवधि 14 अप्रैल तक चलेगी। इस एक महीने के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण, मुंडन और यज्ञोपवीत जैसे सभी मांगलिक कार्य नहीं किए जाएंगे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस समय दान-पुण्य, भगवान विष्णु की पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व होता है।
ज्योतिषाचार्य डॉ. महेन्द्र मिश्रा के अनुसार 14 मार्च को दोपहर करीब एक बजे सूर्य कुंभ राशि से निकलकर मीन राशि में प्रवेश करेंगे। इसी क्षण से मीन संक्रांति के साथ खरमास की शुरुआत हो जाएगी। सूर्य के मीन राशि में प्रवेश करते ही एक महीने तक शुभ कार्यों पर विराम लग जाएगा।
इस अवधि को धार्मिक दृष्टि से साधना, जप-तप और दान के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। खरमास समाप्त होने के बाद ही विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों के शुभ मुहूर्त फिर से शुरू होते हैं। इस वर्ष 14 अप्रैल को दोपहर करीब 2 बजकर 35 मिनट पर सूर्य मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करते ही खरमास समाप्त हो जाएगा। इसके बाद पूरे देश में विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण और अन्य शुभ कार्यों के लिए फिर से शुभ मुहूर्त उपलब्ध हो जाएंगे।
डॉ. मिश्रा ने बताया कि विवाह के शुभ मुहूर्त तय करते समय ज्योतिष में लग्न और नक्षत्र का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वृष, मिथुन, कन्या, तुला, धनु और मीन लग्न विवाह संस्कार के लिए अत्यंत शुभ माने गए हैं। इन लग्नों में ग्रहों की स्थिति अनुकूल मानी जाती है और दांपत्य जीवन के लिए इसे शुभ संकेत माना जाता है। नक्षत्र भी विवाह मुहूर्त तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, मघा, चित्रा, स्वाति, हस्त, अनुराधा और उत्तरा फाल्गुन नक्षत्र विवाह के लिए अनुकूल माने जाते हैं। इन लग्न और नक्षत्रों में विवाह संस्कार करने से वैवाहिक जीवन सुखी और स्थिर रहने की मान्यता है। इसलिए विवाह की तिथि तय करते समय पंचांग, लग्न और नक्षत्र का विशेष ध्यान रखा जाता है।
इस वर्ष अधिकमास और चातुर्मास के संयोग के कारण कई महीनों तक विवाह सहित मांगलिक कार्यों पर रोक रहेगी। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार ज्येष्ठ मास इस बार दो माह तक रहेगा, जिसके कारण 15 मई से 17 जून तक मलमास रहेगा।
इस अवधि में शादी-विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ संस्कार नहीं किए जाते। पंडितों के अनुसार अधिक मास को धार्मिक साधना, दान-पुण्य और भगवान की आराधना के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। इस समय लोग विशेष रूप से व्रत, जप और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
इसके बाद 25 जुलाई से 20 नवंबर तक चातुर्मास रहेगा। मान्यता है कि इस अवधि में भगवान विष्णु योग निद्रा में रहते हैं। इसलिए इस समय भी विवाह और अन्य मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। धार्मिक दृष्टि से यह समय पूजा-पाठ और आध्यात्मिक साधना के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।




















