जयपुर। आज के समय में पाठ्यक्रम निर्माण के लिए उद्योग और शिक्षा जगत के बीच साझेदारी बहुत आवश्यक है। प्रत्येक पाठ्यक्रम में चाहे वह किसी भी स्तर या क्षेत्र से संबंधित हो आर्थिक साक्षरता, वित्तीय साक्षरता, उद्यमिता, वैश्विक जागरूकता, नागरिक साक्षरता, स्वास्थ्य साक्षरता तथा पर्यावरणीय साक्षरता को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। उद्योग जगत को मेंटर्स, फसिलिटेटर्स, प्रशिक्षकों और सह-शिक्षकों के रूप में कक्षाओं तक आना होगा। पाठ्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने से लेकर उसके क्रियान्वयन तक और कक्षा शिक्षण से लेकर वास्तविक कार्य-अनुभव तक, यह पूरा शैक्षणिक पारिस्थितिकी तंत्र उद्योग और शिक्षा संस्थानों द्वारा मिलकर विकसित किया जाना चाहिए। यह बात आईसीएफएआई बिजनेस स्कूल (आईबीएस), जयपुर, निदेशक, डॉ. श्वेता जैन ने फिक्की राजस्थान स्टेट काउंसिल द्वारा आयोजित 10वें एचआर एंड स्किल्स समिट के उद्घाटन सत्र के दौरान कही।
डॉ. जैन ने आगे जोर देते हुए कहा कि भारत का ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (जीईआर) प्रगति और चुनौतियों दोनों की स्पष्ट तस्वीर प्रस्तुत करता है। उन्होंने रेखांकित करते हुए बताया कि जहां प्राथमिक शिक्षा स्तर पर नामांकन दर 93–95 प्रतिशत है, वहीं माध्यमिक शिक्षा में यह घटकर 77–80 प्रतिशत रह जाती है। उच्च माध्यमिक स्तर पर यह लगभग 56 प्रतिशत तक गिर जाती है और उच्च शिक्षा में यह तेजी से घटकर मात्र 28–30 प्रतिशत रह जाती है। इंडिया@2047 के विज़न के अंतर्गत देश का लक्ष्य वर्ष 2035 तक उच्च शिक्षा में जीईआर को 50 प्रतिशत तक पहुंचाने का है, जो शैक्षणिक संस्थानों पर बड़ी जिम्मेदारी पर जोर देता है। उन्होंने बताया कि भारत में लगभग 71 प्रतिशत उच्च शिक्षा संस्थान निजी क्षेत्र में हैं, जो देश की कुल उच्च शिक्षा का लगभग 60–62 प्रतिशत प्रदान करते हैं।
आईबीएम इंडिया और शेल मलेशिया के पूर्व कार्यकारी निदेशक (एचआर) डॉ. अकील बुसरई ने भविष्य के कार्यक्षेत्र में एचआर की बदलती भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संगठनों को अब पारंपरिक तरीकों से हटकर आगे बढ़ने की आवश्यकता है। उन्होंने सबसे पहले एनुअल ट्रेनिंग बुकलेट्स को त्यागने पर ज़ोर देते हुए कहा कि आज के समय में डेटा का उपयोग कर प्रत्येक कर्मचारी की ज़रूरतों के अनुसार कस्टमाइज़्ड ट्रेनिंग तैयार की जानी चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि पारंपरिक सक्सेशन प्लान अब प्रभावी नहीं रह गए हैं, इसलिए ऐसे नए और सरल प्लान विकसित किए जाने चाहिए जो सीधे तौर पर संगठन और व्यवसाय पर सकारात्मक प्रभाव डालें। डॉ. बुसरई ने व्यक्तिगत जुड़ाव को एचआर की सबसे बड़ी ताकत बताते हुए कहा कि एचआर को केवल प्रक्रियाएं जोड़ने के बजाय अपने कार्यों की पुनः समीक्षा करनी चाहिए। कोविड-19 जैसे कठिन और चुनौतीपूर्ण समय का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उस दौर में एचआर प्रोफेशनल्स ने कर्मचारियों से सहानुभूति के साथ जुड़कर, संवाद बनाए रखकर और मानवीय दृष्टिकोण अपनाकर अपनी महत्वपूर्ण और प्रभावशाली भूमिका को साबित किया।
तेज़ी से बदलती कार्यदुनिया में मानव संसाधन (एचआर) की बदलती भूमिका पर जोर देते हुए, फिक्की राजस्थान स्टेट काउंसिल के को-चेयरमैन और इंसोलेशन एनर्जी लिमिटेड, चेयरमैन, मनीष गुप्ता ने कहा कि आज के कर्मचारी केवल रोजगार ही नहीं चाहते, बल्कि उद्देश्य, फ्लैक्सिबिलीटी, वैल-बींग और व्यक्तिगत विकास की भी तलाश रखते हैं। यही कारण है कि एचआर अब संगठन की संस्कृति, उत्पादकता और दीर्घकालीन विकास का रणनीतिक चालक बन गया है। उन्होंने बताया कि जैसे-जैसे राजस्थान विनिर्माण, स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs), सेवा क्षेत्र और पर्यटन में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है, वैसे ही ध्यान नौकरी सृजन से हटकर रोजगार योग्यता और निरंतर कौशल विकास की ओर केंद्रित होना चाहिए। गुप्ता ने अगले दशक के चार परिवर्तनकारी क्षेत्रों जैसे कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रोबोटिक्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल और रिन्यूएबल एनर्जी पर प्रकाश डालते हुए उद्योग और एचआर लीडर्स से यह आग्रह किया कि वे कर्मचारियों को सक्रिय रूप से प्रशिक्षण दें और उन्हें भविष्य का नेतृत्व करने के लिए तैयार करें।
फिक्की राजस्थान स्टेट काउंसिल के सदस्य और अक्षय इन्फ्रासिस इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड, सीएमडी, अक्षय हाडा ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर उन्होंने रोबोटिक्स और एआई के युग में एचआर की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि एआई कभी भी ह्यूमन रिसोर्स की जगह नहीं ले सकता, क्योंकि एचआर मानव जुड़ाव का सशक्त माध्यम है। एचआर भावनाओं को समझता है, नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मकता में बदलता है, समस्याओं के समाधान खोजता है और चुनौतियों व बाधाओं का डटकर सामना करता है। यही प्रक्रिया संगठन में नई ऊर्जा का संचार करती है और विकास की दिशा तय करती है।
फिक्की राजस्थान स्टेट काउंसिल के डायरेक्टर एवं हेड, अतुल शर्मा ने सत्र का संचालन किया। उन्होंने कहा कि यह समिट ऐसे महत्वपूर्ण समय में आयोजित किया गया, जब संगठन श्रम कानूनों में हो रहे परिवर्तनों, कार्यबल की बदलती अपेक्षाओं, तकनीकी बदलावों तथा उभरती कौशल आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को ढाल रहे हैं।
इसके पश्चात, तीन प्लेनरी सेशंस भी आयोजित हुए। पहला प्लेनरी सेशन ‘फ्यूचर वर्कप्लेसेज:रीडिजाइनिंग एचआर फॉर द फ्यूचर ऑफ वर्क’ विषय पर हुआ। दूसरा सेशन ‘कन्टेम्पररी एचआर: लीडिंग पीपल, परफॉर्मेंस एंड कल्चर’ विषय पर और तीसरा प्लेनरी सेशन ‘स्किल डेवलपमेंट: इंडस्ट्री-लेडी मॉडल्स फॉर एम्प्लॉयबिलिटी’ विषय पर आयोजित हुआ।




















