अभिमान त्याग कर प्रभु की शरणागति से ही होता है भक्त का उद्धार : आचार्य डॉ. राजेश्वर

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जयपुर। अजमेर रोड स्थित क्वींस कॉलोनी, नीलकंठ कॉलोनी में श्री सरस निकुंज की पीठ बरसाना में एक जनवरी से आयोजित श्री राम कथा का शुक्रवार को भक्तिमय वातावरण में विश्राम हुआ। छोटे दादा गुरुदेव शुक संप्रदाय पीठाधीश रसिक माधुरी शरण महाराज की 127वीं जयंती के उपलक्ष्य में श्री शुक संप्रदाय पीठाधीश्वर अलबेली माधुरी शरण महाराज का सान्निध्य आयोजित कथा के अंतिम दिवस व्यास पीठ से आचार्य डॉ. राजेश्वर ने लंका दहन एवं राम–रावण युद्ध का अत्यंत सारगर्भित, प्रेरक एवं भावनात्मक वर्णन किया।

उन्होंने कहा कि अभिमान मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। जो व्यक्ति अहंकार में डूब जाता है, उसका पतन निश्चित होता है। रावण इसका जीवंत उदाहरण है। वेदों का ज्ञाता, अपार शक्ति का स्वामी और महान शिव भक्त होने के बावजूद रावण अपने अभिमान के कारण विवेक खो बैठा। दस शीशों का स्वामी होते हुए भी अंततः उसे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के हाथों मरण प्राप्त हुआ।

आचार्य डॉ. राजेश्वर ने कहा कि लंका दहन केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि यह अधर्म, अन्याय और अहंकार के दहन का प्रतीक है। हनुमान जी का लंका दहन यह सिद्ध करता है कि जब भक्त निष्काम भाव से प्रभु की आज्ञा का पालन करता है, तब वह असंभव को भी संभव कर देता है। राम–रावण युद्ध को धर्म और अधर्म के महासंग्राम के रूप में वर्णित करते हुए उन्होंने कहा कि अंततः सत्य, मर्यादा और धर्म की ही विजय होती है।

उन्होंने अपने प्रवचन में यह भी कहा कि जीवन में अभियान नहीं, बल्कि आत्मचिंतन आवश्यक है। अभिमानी व्यक्ति कभी स्थायी सुख और शांति प्राप्त नहीं कर सकता। जब मनुष्य अपने अहंकार को त्याग कर प्रभु की शरण में जाता है, तभी उसका वास्तविक उद्धार संभव होता है।

प्रभु श्रीराम का संपूर्ण जीवन मानवता, करुणा, मर्यादा और समर्पण का आदर्श है। श्री सरस निकुंज के प्रवक्ता प्रवीण बड़े भैया ने सभी संतजनों, विद्वानों एवं श्रद्धालुओं का सम्मान किया। कथा विश्राम के समय संपूर्ण परिसर में भक्ति, श्रद्धा और भाव-विभोर वातावरण व्याप्त रहा। श्रद्धालुओं ने श्री राम कथा के दिव्य प्रसंगों को अपने जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया।

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