स्पॉट लाइट की रोशनी में जली एकल अभिनय की लौ, महफिल ए जयरंगम ने दिया सुकून

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The flame of solo acting lit up in the spotlight, Mehfil-e-Jayarangam gave solace
The flame of solo acting lit up in the spotlight, Mehfil-e-Jayarangam gave solace

जयपुर। 13वें जयरंगम का दूसरा दिन थिएटर, संवाद, कविताओं और संगीत के नाम रहा। अभिनेत्री भूमिका दुबे के निर्देशन में खेले गए नाटक केला में प्रकृति प्रेम, लैंगिक विभेद, शहरीकरण और महिला मन के भावों को मंच के जरिए दर्शकों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया। रंग संवाद में जयपुर के युवा निर्देशकों ने रंगमंच को लेकर अपने प्रयासों, अनुभव व चुनौतियों को साझा किया।

अभिषेक मुद्गल के निर्देश में वीर योद्धा कर्ण के जीवन गाथा को जाहिर करने वाले नाटक रश्मिरथी का मंचन किया गया। प्रिया मलिक ने कविताओं और संगीत के सौंदर्य से सराबोर प्रस्तुति ‘इश्क’ के जरिए महफिल ए जयरंगम को सुकून से भर दिया।

‘केला’…प्रकृति प्रेमी बच्ची जिसे सबने छोड़ा अकेला

कृष्णायन में जयरंगम के स्पॉट लाइट सैगमेंट के तहत केला नाटक का मंचन किया गया। विश्व भर से स्पॉट लाइट के लिए 1200 एंट्री प्राप्त हुई थी जिनमें से चार का चयन किया गया जिनमें से केला एक रहा। अभिनेत्री भूमिका दुबे जिन्होंने 5 से अधिक पात्रों की भूमिका निभाकर मंच पर एकल अभिनय का जादू बिखेरा। ‘केला’, नाम फल का, बात फलों की और जीवनदायी पेड़ों के साथ-साथ नारी जीवन के विभिन्न पहलुओं की जिससे हर कोई जुड़ाव महसूस करता दिखाई दिया।

यह कहानी है केलावती की जिसे प्यार से सब केला बुलाते हैं। शरारती बच्ची केला जो जामुन चोरी करती है और पूरे गांव की नजरों में रहती है। घर में उसकी बात सुनने वाली है सिर्फ दादी। दादी जब उसे बताती है कि तेरा भाई जब दुनिया में आएगा तो सारे जामुन के पेड़ और खेती वो संभालेगा इसलिए तू सिलाई, कढ़ाई में मन लगा। पेड़ और प्रकृति से लगाव रखने वाली केला के बाल मन पर इस बात का गहरा असर होता है।

वो गांव के बाहर एक केले का पेड़ लगाती है रोज उसे पानी देती है और उसकी देखभाल करती है। केला पेड़ को अपना दोस्त बना लेती है, ‘खड़े खड़े हरदम हो रहते, कुछ ना कहते, चुप हो रहते, मेरे प्यारे और सयाने…ओ जामुन जी सुनो पेड़ जी पेड़ जी, जो भी तुमको काटना चाहे, उसे देंगे हम खदेड़ जी…सुनो पेड़ जी सुनो पेड़ जी।’ ऐसे भावपूर्ण कविताएं भी वह पेड़ को सुनाती रहती। इस तरह बातें करता देख लोग केला के विषय में अलग-अलग तरह की बातें भी बनाते। बचपन की दहलीज पार कर केला अब जवानी में कदम रख चुकी थी।

मंगल दोष को टालने के लिए इसी जामुन के पेड़ से पहले केला का विवाह कर दिया जाता है। इसके बाद घर वालों की और से तय युवक से विवाह कर केला शहर में ससुराल चली जाती है। अब केला पहले की तरह नहीं रही, जामुन के फलों के साथ जीवन का रस भी जाता रहा। जिम्मेदारी के बोझ तली दबी केला 78 बरस की हो जाती है लेकिन गांव के जीवन को दिल से नहीं निकाल पाती।

नाटक और कहानी का अंत उसी दृश्य के दोहरान के साथ होता है जिसमें केला बारिश की बूंदों को सहेजकर जामुन के पेड़ में पानी डालती है अंतर इतना है कि पहले केला बच्ची थी वो बात सच्ची थी और अब वह मौत के मुहाने पर खड़ी है और यह सिर्फ कल्पना है लेकिन केला पहले भी अकेली थी और अंत में भी। भूमिका दुबे ने बताया कि एनएसडी में प्रोजेक्ट के लिए 2015 में यह नाटक तैयार किया था। तब कैम्पस में एक युवती को पेड़ पर बैठा देख उन्हें नाटक की कहानी सूझी इसी के साथ महिला भावनाओं का चित्रण परिवार में दादी, नारी और मां के जीवन से किया गया।

युवा मन और रंगमंच…

रंग संवाद में देशराज गुर्जर, अनुरंजन शर्मा, गौरव कुमार, अभिषेक विजय, चिन्मय मदान, शुभम अमेटा और मुदिता चौधरी ने ‘जयपुर शहर का युवा मन और रंगमंच का परिदृश्य’ विषय पर चर्चा की। मूमल तंवर ने सत्र का मॉडरेशन किया। सभी वक्ता युवा निर्देशक है जो रंगमंच को नए आयाम तक पहुंचाने को प्रयासरत है। सभी ने थिएटर से जुड़े अनुभव, संघर्ष, चुनौतियों को साझा किया। चर्चा से निकलकर आया कि युवा मन अपनी बात को नए अंदाज में प्रयोगों के साथ रखने को आतुर है और इसके लिए वे थिएटर को सबसे सशक्त माध्यम मानते हैं। इस सत्र ने युवा रंगकर्मियों को प्रेरित किया अपने ढंग से नए विचारों को साथ रंगमंच पर छाप छोड़ने के लिए।

कर्मवीर कर्ण की गाथा रश्मिरथी…

रंगायन में अभिषेक मुद्गल के निर्देशन में नाटक रश्मिरथी का मंचन किया गया। रामधारी सिंह दिनकर द्वारा लिखित महाकाव्य ‘रश्मिरथी’ पर आधारित नाटक “कर्ण” के जीवन के इर्दगिर्द घूमता है। किन परिस्थितयों में उसकी माँ कुन्ती द्वारा कर्ण के जन्म लेते ही उसका त्यागना, जीवन भर उसका पीछा नहीं छोड़ता। इस नाटक में दिनकर जी ने कर्ण के माध्यम से समाज के सामने एक ज्वलंत प्रश्न रखा है कि किसी व्यक्ति विशेष का आकलन उसकी योग्यता के आधार पर होना चाहिए या उसके वंश के? कर्ण जो कि अर्जुन से कहीं श्रेष्ठ धनुर्धर होते हुए भी अपने सूत वंश के कारण उचित सम्मान नहीं प्राप्त कर पाता।

वो अपनी पालनहार “राधा” का ऋणी है जिसने उसे अपने गले से लगाया और माँ का प्यार दिया बजाय उस माँ के जिसने लोक-लाज के चलते एक नवजात को गंगा की लहरों के सुपुर्द कर दिया। साथ ही वो अपने मित्र दुर्योधन का भी कृतज्ञ है जिसने उसे अंग देश का राजा बनाकर समाज में स्थान दिलवाया। इसके चलते कर्ण मरते दम तक दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ता। एक ओर गुरु द्रोणाचार्य का अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का हठ शिष्य एकलव्य का अँगूठा कटवाता है साथ ही कर्ण को शिष्य न बनाने का प्रण लेते हैं।

किन्तु वो भीतर से जानते हैं कि कर्ण अर्जुन से श्रेष्ठ है। इसके चलते कर्ण गुरु द्रोणाचार्य के भी गुरु “परशुराम” के सानिध्य में कठोर परिश्रम द्वारा प्राप्त की हुई विद्या एक झूठ के कारण गंवा देता है। तो दूसरी ओर भगवान इंद्र छद्म भेष में आकर कर्ण के कवच और कुण्डल दान में मांग लेते हैं। कर्ण का पूरा जीवन त्याग, दान और दुर्योधन और अपनी माँ राधा के प्रति प्रेम और कृतज्ञता से सराबोर है। जिसके कारण वो भगवान श्रीकृष्ण और जन्मदायिनी कुन्ती के समझाए भी नहीं समझता है और दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ता। महाभारत का रण आज भी पूरे समाज को यह सोचने पर बाध्य करता है कि कौरव और पांडवों में से कौन अधिक गलत था?

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