मनरेगा की हत्या,मोदी सरकार ने गरीबों से छीना काम का अधिकार : रंजीत रंजन

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जयपुर। सांसद रंजित रंजन ने प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय इंदिरा गांधी भवन स्टेशन रोड़ जयपुर पर सोमवार को विशेष प्रेस वार्ता में केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि “सुधार” के नाम पर लोकसभा में पारित नए विधेयक के जरिए दुनिया की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी योजना मनरेगा को समाप्त करने की सुनियोजित कोशिश की गई है। यह महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज, काम की गरिमा और विकेंद्रीकृत विकास की सोच पर सीधा हमला है।

उन्होंने कहा कि मनरेगा केवल एक योजना नहीं,बल्कि 12 करोड़ से अधिक ग्रामीण मजदूरों का संवैधानिक अधिकार रहा है। पिछले दो दशकों से यह योजना करोड़ों गरीब परिवारों की जीवनरेखा बनी हुई है और कोविड महामारी के दौरान इसने आर्थिक सुरक्षा का मजबूत आधार प्रदान किया। लेकिन मोदी सरकार ने न सिर्फ गांधीजी का नाम हटाया, बल्कि मजदूरों के अधिकारों को भी बेरहमी से कुचला है।

रंजीत रंजन ने कहा कि 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मनरेगा के विरोधी रहे हैं। उन्होंने इसे कभी “कांग्रेस की नाकामी की निशानी” बताया था। बीते 11 वर्षों में केंद्र सरकार ने बजट कटौती, राज्यों के वैधानिक फंड रोकने, जॉब कार्ड हटाने और आधार आधारित भुगतान अनिवार्य कर करीब सात करोड़ मजदूरों को योजना से बाहर कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि पिछले पांच वर्षों में मनरेगा में औसतन 50-55 दिन का ही रोजगार मिल पाया।

उन्होंने आरोप लगाया कि अब तक मनरेगा संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़े अधिकार आधारित कानून के तहत आती थी। लेकिन नए ढांचे में इसे एक कंडीशनल और केंद्र-नियंत्रित योजना में बदल दिया गया है। यह गरीबों के लिए संवैधानिक वादे को वापस लेने जैसा है।

सांसद ने कहा कि मनरेगा पूरी तरह केंद्र पोषित योजना थी। लेकिन अब सरकार राज्यों पर करीब 50 हजार करोड़ रुपए या उससे अधिक का बोझ डालना चाहती है, जबकि नियंत्रण और श्रेय केंद्र अपने पास रखेगा। यह सहकारी संघवाद के खिलाफ है।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि नए सिस्टम में रोजगार को समय-सीमा में बांधकर मजदूरों को महीनों तक काम से वंचित किया जा सकता है। इससे मजदूरों को मजबूरी में निजी खेतों में सस्ते श्रम के लिए धकेला जाएगा। साथ ही ग्राम सभाओं और पंचायतों के अधिकार छीनकर डिजिटल और केंद्रीकृत सिस्टम के हवाले किए जा रहे हैं।

रंजीत रंजन ने कहा कि मनरेगा की डिमांड-ड्रिवन प्रकृति को खत्म कर केंद्र द्वारा तय सीमित आवंटन प्रणाली लाई जा रही है, जिससे रोजगार का कानूनी अधिकार खत्म हो जाएगा। यह महात्मा गांधी के आदर्शों का अपमान और ग्रामीण रोजगार पर खुली जंग है।
उन्होंने चेतावनी दी कि रिकॉर्ड बेरोजगारी से जूझ रहे देश में गरीब ग्रामीण परिवारों की आखिरी आर्थिक सुरक्षा को खत्म करने की इस साजिश के खिलाफ सड़क से लेकर संसद तक हर मंच पर विरोध किया जाएगा।

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