जयपुर। जवाहर कला केंद्र जयपुर की ओर से जयपुर नाट्य समारोह के अंतर्गत बुधवार को नाटक ‘जामुन का पेड़’ का मंचन हुआ। कृष्ण चंदर द्वारा लिखित यह नाटक गुरमिंदर सिंह पुरी ‘रोमी’ के निर्देशन में हुआ जिसका नाट्य रूपांतरण नीरज गोस्वामी ने किया है। यह कहानी प्रशासनिक अव्यवस्थाओं के चलते होने वाले संघर्षों की है जिसके बोझ तले एक निर्दोष व्यक्ति ने अपनी जान गवा दी।
मंच पर कहानी की शुरुआत सचिवालय के लॉन में गिरे जामुन के पेड़ के ईर्द गिर्द खड़ी भीड़ के साथ होती है जिसका दुख वहां खड़े बहुत से सरकारी कर्मचारी मना रहे हैं। वह याद करते हैं कि इसके जामुन कितने मीठे हैं और यह पेड़ कितना छायादार। तभी एक व्यक्ति की नज़र उस पेड़ के नीचे दबे शख्स पर पड़ती है। जिंदा हो? मर गया शायद? पूछने पर जवाब आता है कि मैं जिंदा हूं, मुझे बाहर निकालो। मालूम पड़ता है कि पेड़ के नीचे दबा यह शख्स शायर है। दरख्त को काटकर शायर को बचाया जा सकता है लेकिन यह फैंसला सरकारी अनुमति का मोहताज है।
ऐसे में यह बात एक महकमे से दूसरे महकमे तक पहुंचती है जिसमें फॉरेस्ट डिपार्टमेंट, हॉर्टीकल्चर डिपार्टमेंट सभी शामिल होते गए लेकिन कोई फैंसला नहीं हो पाता। वह तिल-तिल कर सांसे ले रहा है लेकिन उसकी जान बचाने के लिए जिस पेड़ को काटा जाना है वह एक सरकारी मुद्दा बन चुका है जिसपर फाइलें घूम रही हैं।
नाटक के आखिर में दर्शाए दृश्य ने लोगों को अवाक कर दिया, “सुनते हो? आज तुम्हारी फ़ाइल मुकम्मल हो गई!” सुपरिटेंडेंट ने शायर के बाजू को हिलाकर कहा। मगर शायर का हाथ सर्द था। आँखों की पुतलियाँ बेजान थीं और चींटियों की एक लंबी क़तार उसके मुँह में जा रही थी।
नाटक की प्रस्तुति में हास्य और व्यंग्य के माध्यम से गंभीर सामाजिक मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाया गया। सरकारी प्रक्रियाओं की जटिलता और प्रशासनिक लापरवाही पर कटाक्ष करते हुए, यह नाटक दर्शकों को गहरे विचार करने पर मजबूर कर देता है। मंच पर नीरज गोस्वामी, ईश्वर दत्त माथुर, राजेंद्र शर्मा, लोकेश सिंह, मोईनुद्दीन खान, दीपक कथूरिया, अशोक माहेश्वरी, राहुल मीणा, धनराज दाधीच ने अभिनय किया और मंच परे अनिल मारवाड़ी ने लाइट, गुलज़ार हुसैन ने म्यूजिक और सेट पर मनोज, रेनू व अंकित ने जिम्मेदारी संभाली।




















