इंसान टाइमपास करने वाला ‘पॉपकॉर्न’ नहीं है!, नाटक से मानवीय संवेदना को संबल देने का प्रयास

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Human beings are not 'popcorn' to pass time
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जयपुर। जवाहर कला केन्द्र की पाक्षिक नाट्य योजना के अंतर्गत शुक्रवार शाम रंगायन सभागार में नाटक ‘पॉपकॉर्न’ का मंचन किया गया। नाटक का लेखन और निर्देशन वरिष्ठ नाट्य निर्देशक आशीष पाठक ने किया। नाटक के जरिए बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और कुत्सित मानसिकता पर हास्यात्मक तरीके से प्रहार करते हुए बेहतर इंसान बनने पर जोर दिया गया। नाटक का यह 16वां मंचन रहा, जयपुर में पहली बार यह नाटक मंचित किया गया।

निर्देशक आशीष पाठक ने एकल अभिनय के माध्यम से मुख्य पात्र रूपक की कहानी को मंच पर साकार किया। इस कहानी को मंचित करने के लिए आठ पात्रों का उपयोग किया इन सभी के किरदार खुद आशीष पाठक ने निभाए। देशभक्ति का जज्बा लिए रूपक अपने चार दोस्तों के साथ गांव से सेना में भर्ती होने के लिए शहर जाता है। सेना भर्ती में शामिल होने वाले हुजूम को नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज करने वाले पुलिसकर्मियों को देखकर रूपक हताश हो जाता है।

भर्ती एक माह के लिए स्थगित हो जाती है। संपन्न परिवारों से आने वाले सभी दोस्त घर निकल जाते हैं, रूपक स्टेशन पर ही रहता है। यहां गुरु की भूमिका में एक शख्स रूपक को पॉपकॉर्न बेचने को प्रोत्साहित करता है। एक माह गुजारा करने को रूपक बन जाता है पॉपकॉर्न वाला।

नाटक में मानवीय संवेदनाओं को प्रमुखता से जाहिर किया गया। रूपक स्टेशन पर एक मानसिक विक्षिप्त युवती टुकिया को रोज पॉपकॉर्न के पैकेट दिया करता था। एक दिन उस युवती के साथ अनहोनी घटती है, एक फल वाला उससे बलात्कार करता है। टुकिया पॉपकॉर्न का थैला अपने पर उड़ेल लेती है, ‘हां मैं पॉपकॉर्न हूं, आपका टाइमपास हूं मुझे खा जाइए’, इस संवाद में टुकिया का दर्द झलकता है।

इस पर सौम्य स्वभाव रूपक का धैर्य जवाब दे जाता है और वह फल वाले से मारपीट करता है। नाटक में दर्शाया गया कि मानव किस तरह अमानवीय हो गया है। ‘अच्छी शासन व्यवस्था, अर्थव्यवस्था को लेकर सभी चिंतन करते हैं, अच्छा इंसान बनने पर कोई विचार नहीं करता’, इन्हीं संवादों के साथ नाटक का समापन होता है। कंचन विश्वास और सोनू सहाय ने प्रकाश संयोजन, आदित्य तिवारी ने संगीत संयोजन व कॉस्ट्यूम और बेक स्टेज की व्यवस्था मन तिवारी व अश्मी सिंह ने संभाली।

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