देसी ठंडक की वापसी: बाजारों में बढी मटकों की मांग ने पकड़ी रफ्तार

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The Return of Traditional Cooling: Demand for Earthen Pots Gains Momentum in Markets
The Return of Traditional Cooling: Demand for Earthen Pots Gains Momentum in Markets

जयपुर। प्रदेश में भीषण गर्मी के बीच एक बार फिर लोगों का रुझान पारंपरिक मिट्टी के घड़ों की ओर बढ़ने लगा है। फ्रिज और आरओ के दौर में भी मटकों का पानी अपनी प्राकृतिक ठंडक और स्वाद के कारण लोगों की पहली पसंद बनता जा रहा है।

राजधानी जयपुर सहित प्रदेशभर में इन दिनों मिट्टी के घड़ों की बिक्री तेज हो गई है। बाजार में पारंपरिक घड़ों के साथ नल लगे, रंगीन और सजावटी डिजाइन वाले मटके भी उपलब्ध हैं, जो रसोई से लेकर ड्राइंग रूम तक में उपयोग किए जा रहे हैं। विक्रेताओं के अनुसार शहर में प्रतिदिन 1200 से 1500 मटके बिक रहे हैं। इस बार मटकों की कीमत करीब 200 रुपए तक पहुंच गई है।

व्यवसायी रमेश प्रजापत ने बताया कि अब बाजार में स्थानीय के साथ-साथ बाहर से आने वाले, विशेषकर बंगाल के पेंटेड मटकों की भी मांग है, जिनमें पानी का रिसाव नहीं होता और इन्हें घर के भीतर रखने के लिए पसंद किया जाता है। वहीं पारंपरिक मटकों में हल्का रिसाव होने से वे ठंडे रहते हैं।

मटका विक्रेता सुरेश प्रजापत के अनुसार इन मटकों के निर्माण में विशेष मिट्टी और बजरी का उपयोग किया जाता है, जिससे मटका नम बना रहता है और हवा लगने पर पानी स्वाभाविक रूप से ठंडा होता है। राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश तक इन मटकों की अच्छी मांग है।

चिकित्सक महेश सिंह का कहना है कि बहुत ठंडा पानी शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है, जबकि घड़े का पानी शरीर के तापमान के अनुरूप होता है और पाचन में भी सहायक होता है। मटके का पानी सामान्यतः 13-14 डिग्री तक ठंडा रहता है, जो लू और एसिडिटी से बचाव में मददगार है।

मटका खरीदने आई वर्षा ने बताया कि गर्मियों में फ्रिज के बजाय मटके का पानी ज्यादा सुरक्षित और स्वास्थ्यवर्धक होता है, इसलिए हर साल मटका खरीदा जाता है।

बिना बिजली के ठंडा पानी उपलब्ध कराने वाले ये मिट्टी के घड़े न केवल पर्यावरण के अनुकूल हैं, बल्कि कुम्हारों के पारंपरिक व्यवसाय को भी नई ऊर्जा दे रहे हैं।

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