जैसलमेर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जैसलमेर के डेडानसर मैदान में तीन दिवसीय चादर महोत्सव की शुरूआत की। गच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभ सुरीश्वर जी महाराज की निश्रा में आयोजित कार्यक्रम के पहले दिन धर्मसभा को संबोधित करते हुए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक एकात्मता, सामाजिक सद्भाव एवं समरसता में दादागुरु परंपरा का अहम योगदान है।
आज सैंकड़ों की संख्या में दादाबाड़िया धार्मिक अनुष्ठानों, परपंरा, लेखन, आध्यात्म और संस्कृति की वाहक बनी हुई है। कार्यक्रम का विशेष आकर्षण 7 मार्च को विश्वभर में एक साथ 1 करोड़ 8 लाख श्रद्धालुओं द्वारा सामूहिक दादागुरु इकतीसा पाठ का ऐतिहासिक महासंकल्प है। महोत्सव स्थल से पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने जैसलमेर किले में दादा जिनदत्त सूरि की पवित्र चादर का दर्शन किया।
कार्यक्रम का आयोजन दादा गुरूदेव श्री जिनदत्तसुरि चादर महोत्सव समिति के अंतर्गत हो रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, हिन्दू आध्यात्मिक एवं सेवा संस्थान, विद्या भारती तथा अनेक सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं के प्रतिनिधि कार्यक्रम में सहभागी हैं। इस विराट महोत्सव के स्वप्न दृष्टा पूज्य आचार्य श्री जिनमनोज्ञ सागर जी है। चादर महोत्सव समिति के चेयरमैन महाराष्ट्र सरकार के मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा एवं संयोजक जीतो के पूर्व चेयरमैन तेजराज गोलेछा है। आयोजन में विभिन्न भारतीय परंपराओं के करीब 400 संतों सहित करीब 20 हजार श्रद्धालुओं की तीन दिवसीय कार्यक्रम में मौजूदगी रहेगी।
दादा गुरुदेव श्री जिनदत्त सूरि चादर समिति के तत्वावधान में संपन्न कार्यक्रम में इस अवसर पर मंच पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, गच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभ सूरि, आचार्य श्री मनोज्ञ सागर सूरि, महोत्सव समिति के अध्यक्ष मंगल प्रभात लोढ़ा, जैसलमेर की पूर्व महारानी रासेश्वरी राज्य लक्ष्मी, पद्मश्री डॉ डी आर मेहता, राष्ट्रीय संयोजक तेजराज गोलेच्छा, समन्वयक प्रकाश चंद लोढ़ा और समायोजक महेंद्र भंसाली मौजूद रहे। मंच के दोनों तरफ़ जैन एवं हिंदू संतों के सान्निध्य में कार्यक्रम को आध्यात्मिक गरिमा प्राप्त हुई।
आरएसएस प्रमुख का संबोधन – जैसलमेर दादा गुरुदेव जिनदत्त सूरि चादर महोत्सव जैसलमेर ने कहा कि दादागुरु की परंपरा में दिखाई देने वाला चमत्कार दरअसल सनातन संस्कृति के उस भाव का प्रतीक है, जो समस्त सृष्टि में एकत्व का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने गहन आकलन के बाद यही सत्य बताया है कि जीवन में विविधता अवश्य है, लेकिन यदि केवल विविधता को ही जगह दी जाए तो एकता की जगह अनेकता दिखाई देती है।
चादर महोत्सव में अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि जैन दर्शन हमें सिखाता है कि जो जहाँ है, वहीं से आगे बढ़कर ईश्वर तक पहुँच सकता है। भगवान तक पहुँचने के अनेक मार्ग हैं, लेकिन यदि श्रद्धा और विश्वास के साथ उस मार्ग पर चला जाए तो अंततः भगवान का साक्षात्कार अवश्य होता है।

उन्होंने बताया कि दादा जिनदत्त सूरि ने समाज में आपसी भेदभाव को मिटाने का कार्य किया। दादागुरु ने राजाओं से लेकर समाज के प्रत्येक वर्ग को सही राह दिखाई और पूरी दुनिया को एकता का पाठ पढ़ाया।
वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज चारों ओर हालात विकट दिखाई दे रहे हैं। महायुद्ध जैसी स्थितियों को टालने के प्रयास हो रहे हैं, लेकिन दुनिया में झगड़े इसलिए होते हैं क्योंकि हम अपने वास्तविक एकत्व को पहचान नहीं पाते। यदि हम इस एकत्व को पहचान लें तो अधिकांश समस्याओं का समाधान अपने आप हो सकता है।
उन्होंने कहा कि मूल रूप से सभी में एक ही तत्व है, अंतर केवल व्यवस्था का है, ऊँच-नीच का नहीं। समाज में सभी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जहाँ-जहाँ आप जाते हैं, वहाँ वे सभी प्रकार के हिंदुओं को एक ही परिवार माने। सुख-दुख में साथ रहने वाला, साथ बैठने और भोजन करने वाला।
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि वर्तमान समय चुनौतीपूर्ण है और समाज को सजग रहने की आवश्यकता है। यदि देश के लिए जीने और आवश्यकता पड़े तो मरने का संकल्प समाज में जाए, तो हर संकट का सामना किया जा सकता है।
गुरुदेव का संबोधन :
चादर महोत्सव के अवसर पर आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति जिनमणिप्रभ सूरि ने अपने संबोधन में कहा कि कार्यक्रम में विभिन्न हिंदू संतों की उपस्थिति से आयोजन की गरिमा और भी बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि जब इस महोत्सव का विचार सामने आया था, तभी से यह स्पष्ट था कि यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि दादागुरु की महिमा को जन-जन तक पहुँचाने का माध्यम बनेगा।
आचार्य श्री ने कहा कि आज जो भव्य आयोजन दिखाई दे रहा है, वह दादागुरु के श्रद्धालुओं की आस्था और समर्पण का परिणाम है। श्रद्धालुओं ने मिलकर एक स्वप्न को साकार कर दिखाया है। उन्होंने कहा कि दादागुरु की कृपा और उनकी शिक्षाओं का ही प्रभाव है कि यह महोत्सव इतने व्यापक रूप में संपन्न हो रहा है।
उन्होंने आगे कहा कि देश के युवाओं को सही दिशा और सन्मार्ग की प्रेरणा देना आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस दिशा में संत समाज की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने उपस्थित सभी संतों से आह्वान किया कि वे युवाओं को संस्कार, संयम और सदाचार का मार्ग दिखाएँ, ताकि समाज और राष्ट्र का भविष्य सुदृढ़ बन सके।

नगर उदघाटन में भक्ति और श्रद्वा का सैलाब
धर्मसभा से पहले जैसलमेर के महोत्सव स्थल पर पूज्य गच्छाधिपति, आचार्य, उपाध्याय, गणि, श्रमक-श्रमिणों का मंगल प्रवेश हुआ। लाभार्थी परिवारों ने नगर उद्घाटन किया। चादर महोत्सव समिति के चेयरमैन मंगल प्रभात लोढ़ा का कहना है कि यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर आस्था, एकता और आध्यात्मिक जागरण का महाअभियान है। पूरी जैसलमेर नगरी इस आध्यात्मिक आयोजन की साक्षी बनी हुई है।
सात मार्च को विश्वभर के विभिन्न नगरों में श्रद्धालु अपने-अपने स्थानों से एक साथ दादागुरु इकतीसा पाठ करेंगे, जिससे आध्यात्मिक चेतना की सामूहिक तरंग उत्पन्न होगी। इस विराट संकल्प के प्रेरणास्रोत पूज्य आचार्य श्री जिन मनोज्ञ सागर जी हैं, जिनकी प्रेरणा से यह आयोजन वैश्विक आध्यात्मिक आंदोलन का रूप ले रहा है। दादा गुरूदेव श्री जिनदत्तसुरि चादर महोत्सव में 871 वर्षों बाद पहली बार चादर का विधिवत अभिषेक होगा, इससे पहले जैसलमेर किले से भव्य वरघोड़े के साथ चादर को महोत्सव स्थल पर लाया जाएगा।
तीन दिन दादागुरू की महिमा और आस्था से जुड़े विभिन्न आयोजन
आयोजन समिति के सचिव पदम टाटिया ने बताया कि जैसलमेर में चादर महोत्सव के दूसरे दिन 7 मार्च को जैसलमेर किले से चादर वरघोड़ा निकलेगा। इसके बाद 1 करोड़ 8 लाख श्रृद्वालु पूरे विश्व में दादा गुरू इकतीसे का पाठ करेंगे। दोपहर में चादर अभिषेक और पूजा होगी। सांस्कृतिक संध्या में प्रख्याात संगीतकार भक्ति महोत्सव में अपनी प्रस्तुति देंगे। पूज्य उपाध्याय मनितप्रभ सागरजी की ओर से लिखित द यूनिवर्सल ट्रूथ एवं डॉ विद्युत्प्रभा श्रीजी की पुस्तक गुरुदेव का विमोचन होगा। आठ मार्च को एक विशिष्ट कार्यक्रम का आयोजन होगा एवं उपाध्याय महेन्द्रसागर महाराज को आचार्य पद प्रदान किया जाएगा साथ ही गणिनी पद समारोह भी आयोजित होगा। इसी दिन चादर अभिषेक जल और वासक्षेप का वितरण होगा।
पूज्य आचार्य श्री जिनमनोज्ञ सागर जी प्रेरणा से महोत्सव
दादागुरू इकतीसा समिति के राष्ट्रीय संयोजक ज्योति कोठारी ने बताया कि तीन दिवसीय महोत्सव के दूसरे दिन सात मार्च को 1 करोड़ 8 लाख श्रृद्वालु दादागुरू इकतीसा का पाठ करेंगे। इस कार्यक्रम में विश्व हिंदू परिषद के संपूर्ण भारत के करीब 30 हजार मिलन एवं सत्संग केंद्रों, देशभर की सभी दादाबाड़ियो, विद्याभारती राजस्थान के 1000 स्कूलों, सभी जैन मंदिरों और अनेक हिंदू मंदिरों में दादागुरू इकतीसा का सामूहिक पाठ होगा।
श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र है पवित्र चादर
जैसलमेर जैन ट्रस्ट के अध्यक्ष महेंद्र सिंह भंसाली का कहना है कि प्रथम दादागुरु आचार्य श्री जिनदत्त सूरी 11वीं शताब्दी के महान आध्यात्मिक आचार्य माने जाते हैं। परंपरा अनुसार अजमेर में राजा अर्णोराज द्वारा प्रदत्त भूमि पर उनका अग्नि-संस्कार हुआ, जहाँ अग्नि-संस्कार के समय चादर का नहीं जलना एक अलौकिक घटना के रूप में प्रतिष्ठित हुआ, जो आज भी श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र है। ऐतिहासिक उल्लेख के अनुसार लगभग डेढ़ शताब्दी पूर्व जैसलमेर के महारावल ने महामारी शमन हेतु अनहिलपुर पाटन से यह चादर मंगवाई थी। वर्तमान में यह चादर जैसलमेर दुर्ग स्थित श्री जिनभद्र सूरी ज्ञान भंडार में सुरक्षित है। इसी दिव्य चादर के श्रद्धालुओं द्वारा सार्वजनिक दर्शन हेतु प्रथम बार यह महोत्सव आयोजित किया गया है ।




















