जवाहर कला केन्द्र में बुकरू चिल्ड्रन लिटरेचर फेस्टिवल का शुभारंभ:बुकरू के संग बच्चों की रचनात्मकता को लगे पंख

जयपुर । ‘दुनिया एक कविता है, आओ, इसके रंग में रंग जाओ’, ‘ना राजा था ना रानी थी अलबेली बड़ी कहानी थी’, ये कहानियां है सपनों भरी उस दुनिया कि जो बच्चों की कल्पनाओं से आकार ले रही है। ऐसी ही अनोखी कहानियों, किस्सों और रचनात्मक गतिविधियों के जरिए बच्चों को किताबों से जोड़ने के लिए जवाहर कला केन्द्र की ओर से आयोजित बुकरू चिल्ड्रन लिटरेचर फेस्टिवल की शनिवार को शुरुआत हुई।

जेकेके की ओर से होने वाली साहित्यिक गतिविधियों के क्रम में कला संसार के अंतर्गत हो रहे फेस्टिवल का उद्घाटन केन्द्र की अतिरिक्त महानिदेशक प्रियंका जोधावत ने डूडल वॉल पर कल्पनाओं के रंग उकेर कर किया। बड़ी संख्या में पेरेंट्स के साथ पहुंचकर बच्चे इस उत्सव में हिस्सा ले रहे हैं। पहले दिन 26 एक्टिविटी में बच्चे शामिल हुए। रविवार सुबह 11 बजे से शाम 4:30 बजे तक 4 से 14 वर्ष के बच्चे फेस्टिवल में नि:शुल्क हिस्सा ले सकते हैं।

फेस्टिवल में कहानी कुंड, क्राफ्ट कॉर्नर, डूडल वॉल, ऑडिटोरियम, स्टूडियो जोन बनाए गए हैं जहां अलग-अलग एक्टिविटी हो रही हैं। इसी के साथ बुक फेयर भी लगाया गया है जहां बाल साहित्य से जुड़ी कृति खरीद सकते हैं। इतना ही नहीं लैंड ऑफ स्टोरी व इमो ट्री जैसी ऑनगोइंग एक्टिविटी भी है।

हंसते—खिलखिलाते बच्चे सुबह जवाहर कला केन्द्र में जुटने लगे थे। उनके चेहरे पर एक चमक थी अपनी दुनिया में खो जाने की वह दुनिया जो बड़ों से अलग है। वे कल्पनाओं के रंगों से अपने मन के कैनवास पर सपनों को साकार करते हैं। आयु वर्ग के हिसाब से बच्चे सेशन में पहुंचे। कहानी कुंड में इंस्ट्रक्टर कहानियों के साथ बच्चों को रचनात्मक सफर पर ले गए।

शिवानी कांडोलिया ने पपेट्स के जरिए कहानी कही। स्वेचा प्रसाद ने अक्कड़—बक्कड़ टेल्स में जंगल में एडवेंचर करने पहुंचे तीन भाईयों की कहानी सुनाई। इसी तरह वसुंधरा बहुगुणा, शर्लिन पिमेंता, ममता नैनी, दीपा किरण ने अलग-अलग कहानियों से बच्चों को कल्पनाओं की दुनिया से जोड़ा।

कृष्णायन स्टूडियो में तब्दील हुआ। यहां नाट्य निर्देशक अभिषेक मुद्गल ने अलग-अलग पात्र साकार करने, वॉयस मॉड्यूलेशन के जरिए थिएटर से जोड़ने का प्रयास किया। अनुपम अरुणाचलम ने सभी बच्चों को भाई-बहनों के प्रेम को जाहिर करने का मौका दिया। दीपा किरण बच्चों को विदूषक तेनालीराम के तार्किक और मजेदार जवाबों की दुनिया में ले गयी। नंदिनी नायर ने मिनी की कहानियों के जरिए बच्चों को प्रश्न करने का महत्व बताया।

रंगायन ऑडिटोरियम में विक्रमजित सिंह रूपराई ने मजेदार तरीके से बच्चों को बावड़ियों और कुओं के निर्माण के पीछे छिपे वैज्ञानिक कारणों से रूबरू करवाया। उन्होंने बताया कि हर चीज के पीछे विज्ञान है बस हम देखते नहीं है। कमल काबुलीवाला का सेशन बच्चों और पेरेंट्स दोनों के लिए था। यहां अपनी मातृभाषा से जुड़ने और मोबाइल के हद से ज्यादा प्रयोग से बचने की सीख दी गयी।

गायत्री ने भावनाओं को जाहिर करने के महत्व पर प्रकाश डाला। दीपा अग्रवाल का सेशन खाने से जुड़े रोचक प्रयोगों से जुड़ा रहा। क्राफ्ट कॉर्नर में श्रुति हेमानी, इकरूप संधु, टीम अदिगामी, टीम नीला हाउस ने बच्चों को अलग-अलग क्राफ्ट बनाने का हुनर सिखाया। डूडल वॉल सेशन में बोस्की जैन, अजित नारायण, लिकला और शर्लिन पिमेंता ने विजुअल आर्ट से जुड़ी बारीकियां सिखाई।

बुकरू फेस्टिवल डायरेक्टर स्वाति राय ने बताया कि किताबें बच्चों की सबसे बड़ी दोस्त है। वर्तमान दौर में पेरेंट्स की यह शिकायत रहती है कि बच्चे पढ़ाई से दूर हो रहे हैं। हमें तरीका बदलने की जरूरत है। साहित्यकार बच्चों के ज्यादा करीब होते है क्योंकि वे उनके भावों को शब्दों का रूप देकर किताब में तब्दील करते हैं, वे हर चीज को बच्चों की नजर से देखते हैं। बुकरू फेस्टिवल ऐसे साहित्यकारों से बच्चों को रूबरू करवाने का अवसर है।

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