जेकेके में डॉ. बीना की प्रदर्शनी का आगाज

0
41

जयपुर। नारी तू नारायणी, भारतीय दर्शन में स्त्री जीवन का आधार है और देवी स्वरूप में पूज्य है, इसी दिव्य जीवनदायिनी ऊर्जा से लोगों को साक्षात्कार करवा रही है ‘एका द वन’ प्रदर्शनी। जवाहर कला केन्द्र की अलंकार दीर्घा में केरल की वरिष्ठ चित्रकार डॉ. बीना एस. उन्नीकृष्णन की ट्रैवल एग्जीबिशन की प्रदर्शनी का सोमवार को आगाज हुआ। प्रदर्शनी में 64 योगिनियों की पेंटिंग्स प्रदर्शित की गयी है। देवी साधना में 64 योगिनियों का महत्वपूर्ण स्थान है। ये योगिनियां अलग-अलग ऊर्जा की प्रतिनिधि हैं और विभिन्न सिद्धियां देने वाली हैं, इन्हीं ऊर्जाओं का अनुभव यह प्रदर्शनी करवा रही है।

डॉ. बीना ने 5 सालों में ये 68 पेंटिंग्स तैयार की है। यह कलात्मक यात्रा महात्रिपुरासुंदरी के चित्रण के विचार से आरंभ हुई, जिसने आगे बढ़ते हुए एक व्यापक साधना का रूप ले लिया। यह ट्रैवलिंग एग्ज़िबिशन कोच्चि, कोयंबटूर, बेंगलुरु, मुंबई, भोपाल और अहमदाबाद के बाद जयपुर पहुँची है। यह कलात्मक आध्यात्मिक ट्रैवलिंग एग्जीबिशन 81 दिन की है जो 16 राज्यों से होती हई लगभग 10 हजार किमी का सफर तय करेगी। यह प्रदर्शनी 18 फरवरी तक प्रतिदिन सुबह 11 बजे से शाम 7 बजे तक कला प्रेमियों के लिए खुली रहेगी।

डॉ. बीना बताती हैं कि उनके भीतर की स्त्री ऊर्जा ने ही उन्हें इस कलात्मक सफर पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। वे मानती हैं कि स्त्री शक्ति ने स्वयं उन्हें चुना कि वे उसे अपने चित्रों में साकार करें। 64 योगिनियों के चित्र पूर्ण करने के पश्चात उन्होंने इनके मंदिर की यात्रा की। यह अनुभव उनके लिए अत्यंत गहरा और परिवर्तनकारी सिद्ध हुआ।

प्रत्येक पेंटिंग में योगिनी का आकार, श्रृंगार, चमकते नेत्र और लहराते केशों का स्वरूप भिन्न दिखाई देता है। उनकी ऊर्जा भी एक-दूसरे से अलग और विशिष्ट महसूस होती है। प्रदर्शनी के अवसर पर 60 मिनट की डॉक्यूमेंट्री का भी प्रदर्शन किया गया। इस डॉक्यूमेंट्री में योगिनियों के इतिहास, उनकी ऊर्जा और पौराणिक महत्व को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। बता दें कि यह कलाकार द्वारा निर्मित है और इसका निर्देशन डॉ. जैन जोसेफ ने किया है।

अपने कलात्मक सफर के बारे में बात करते हुए डॉ. बीना ने बताया कि उनकी पहली प्रदर्शनी वर्ष 1998 में आयोजित हुई थी। तब से अब तक बनाई गई प्रत्येक पेंटिंग ने उनके व्यक्तित्व को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हर रचना के साथ वे एक बेहतर इंसान के रूप में विकसित होती गई हैं। चौंसठ योगिनियों पर केंद्रित यह साधना उनके लिए केवल एक कलात्मक प्रक्रिया नहीं रही, बल्कि एक गहन आत्मिक यात्रा सिद्ध हुई।

इन दिव्य ऊर्जाओं ने उनके भीतर के भय, संशय और अतिचिंतन को धीरे-धीरे दूर किया है। इससे उन्हें आत्मविश्वास, संतुलन और आंतरिक शांति प्राप्त हुई है। आज भी वे गहराई से महसूस करती हैं कि यह दैवी शक्ति हर क्षण उनके साथ है। यही उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा है, जो उन्हें निरंतर सृजन, साधना और आत्म विकास की राह पर आगे बढ़ने का संबल देती है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here