शिव-शक्ति की आराधना का अनूठा संगम:गीता गायत्री मंदिर में 1100 से अधिक कन्याओं और बटुकों का भव्य पूजन

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जयपुर। शारदीय नवरात्र का पावन पर्व इन दिनों देश भर में पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इसी कड़ी में गुलाबी शहर जयपुर के ऐतिहासिक गलता गेट स्थित मंदिर श्री गीता गायत्री जी में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने सनातन संस्कृति की प्राचीन परंपरा, आत्मीयता और लोक-कल्याण के भाव को एक सूत्र में पिरो दिया। शारदीय नवरात्र की पंचमी तिथि पर आयोजित भव्य कन्या-बटुक पूजन महोत्सव का, जहां संत समाज के सानिध्य में 1100 से अधिक कन्याओं और बटुकों का एक साथ पूजन कर अनूठा संदेश दिया गया।

इस भव्य आयोजन के पीछे एक गहरी आध्यात्मिक मान्यता जुड़ी हुई है। पं. राजकुमार चतुर्वेदी के सानिध्य में हुए इस पूजन के बारे में बताते हुए मंदिर प्रशासन ने साझा किया कि सनातन परंपरा में कन्या पूजन जहां मां आदिशक्ति की आराधना का प्रतीक है, वहीं बटुक पूजन भगवान शिव के भैरव स्वरूप की उपासना को दर्शाता है।

धर्म ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार माता के दर्शन के बाद भैरव जी के दर्शन का विशेष महत्व होता है। यही कारण है कि देश के प्रसिद्ध शक्तिपीठों जैसे माता वैष्णो देवी और जयपुर के ही आमेर स्थित शिला देवी मंदिर में माता के दर्शन के पश्चात भैरव दर्शन की परंपरा का निर्वहन किया जाता है। इसी पवित्र मान्यता के अनुरूप, मंदिर श्री गीता गायत्री जी में कन्याओं के साथ-साथ बटुकों का भी समान रूप से पूजन किया गया, जो ‘शिव और शक्ति’ की एकात्मता को जीवंत करता है।

महोत्सव की भव्यता में चार चांद लगाने के लिए शहर के कई प्रतिष्ठित संत-महात्मा उपस्थित रहे। संत समाज के अध्यक्ष सियाराम दास महाराज, घाट बालाजी मंदिर के सुदर्शनाचार्य महाराज, नहर के गणेश जी मंदिर के मानव शर्मा और जय कुमार ने पूरी तन्मयता के साथ माता के नौ स्वरूपों की आरती उतारी। संतों के कर-कमलों से जब बच्चों को तिलक लगाया गया और उपहार भेंट किए गए, तो पूरा मंदिर परिसर भक्तिमय जयकारों से गूंज उठा।

बच्चों को केवल ईश्वर का स्वरूप मानकर पूजना ही नहीं, बल्कि उनके प्रति सेवा भाव रखना इस आयोजन का मुख्य केंद्र बिंदु रहा। पूजन के उपरांत सभी 1100 से अधिक बच्चों को बड़े ही प्रेम और आदर के साथ पारंपरिक और गर्मागर्म प्रसाद परोसा गया। बच्चों के लिए पूरी, हलवा, चने की सब्जी, आलू की सब्जी और भुजिए का विशेष प्रबंध किया गया था। भोजन के बाद बच्चों का चरण पूजन किया गया, उन्हें तिलक लगाया गया और मनमोहक उपहार तथा दक्षिणा देकर ससम्मान विदा किया गया।

महोत्सव के अंत में सभी संतों और आयोजकों ने मिलकर विश्व के जनकल्याण, शांति और समृद्धि की मंगल कामना की। गलता गेट के इस पावन प्रांगण में हुआ यह आयोजन जयपुर के धार्मिक पटल पर एक यादगार और प्रेरणादायी अध्याय बन गया है।

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