पतंग-मांझा और चरखी से सजा जयपुर: मकर संक्रांति पर छतें बनेंगी अखाड़ा

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जयपुर। मकर संक्रांति आज है और जयपुर का आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से सजने को तैयार है। शहर में पतंगबाजी का क्रेज अपने चरम पर है और इसकी सबसे बड़ी पहचान बनी मांझा और चरखी। मकर संक्रांति से एक दिन पहले किशनपोल बाजार, हांडी पुरा सहित शहर के प्रमुख बाजारों में सुबह से देर रात तक पतंग, मांझा और चरखी की खरीदारी को लेकर जबरदस्त रौनक देखने को मिला।

किशनपोल बाजार के मांझा कारोबारी सिनोद खूंटेटा ने बताया कि जयपुर में बिकने वाला अधिकांश मांझा वर्धमान कॉटन की डोर से तैयार किया जाता है। डोर पर सुताई कर 4,6 और 9 तार का मांझा बनाया जाता है। आमतौर पर 4 तार का मांझा ज्यादा चलता है। लेकिन इस बार 4 तार–123 ग्रुप और 6 तार–8400 ग्रुप की मांग सबसे अधिक है। खास बात यह है कि अब ग्राहक सीधे कारीगरों के नाम से मांझा मांग रहे हैं, जिससे पतंगबाजी में अनुभव और तकनीक का महत्व साफ झलकता है।

मांझे की पहचान अनुभव से

मांझा विक्रेताओं के अनुसार मांझा खींच का है या शह का,यह केवल डोर पर नहीं बल्कि पतंग उड़ाने वाले के अनुभव पर निर्भर करता है। जानकार पतंगबाज मांझे को जमीन पर गिराकर उसकी जांच करते हैं—डोर में मुलायमपन,सुताई की समानता और गुच्छा बनने या न बनने से उसकी गुणवत्ता परखी जाती है। अच्छी सुताई वाले मांझों में 4 तार–123 और 6 तार–8400 ग्रुप सबसे अधिक पसंद किए जा रहे हैं।

मैदानी मांझे की खास पहचान

बाजार में मैदानी मांझे की भी जबरदस्त डिमांड रही । ये मांझे विशेष कारीगरों द्वारा बनाए जाते हैं और उन्हीं के नाम से बिकते हैं। कारीगरों की कोलकाता में होने वाली प्रतियोगिताओं में श्रेष्ठ मांझे को गोल्ड मेडल मिलता है। जिसके बाद वही डोर पूरे देश में पहचान बना लेती है। इससे मांझा सिर्फ डोर नहीं,बल्कि कला और प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया है।

चरखी में भी विकल्पों की भरमार

मांझा विक्रेता जावेद ने बताया कि बाजार में एक रील से लेकर 12 रील तक की चरखी उपलब्ध है। एक रील में करीब 900 मीटर या 1000 गज डोर होती है। ऊपर से देखने में एक डोर दिखने वाली इस चरखी में 4 या 6 तार गूंथे होते हैं, जिन्हें रगड़कर पहचाना जा सकता है। छतों पर दंगल लड़ाने वाले पतंगबाज इसे ध्यान में रखकर ही खरीदारी कर रहे हैं।

आधुनिकता का तड़का

इस बार बाजार में इलेक्ट्रिक चरखी भी आकर्षण का केंद्र बनी।, जिसकी कीमत 1000 से 2 हजर 500 रुपये तक है। यह रिचार्जेबल है और एक चार्ज में करीब 100 मिनट चलने का दावा किया जा रहा है। वहीं मुरादाबाद में डिजाइन होकर आई मेटल की गोल्डन चरखी मजबूती और आकर्षक लुक के कारण खूब पसंद की गई।

महंगाई के बावजूद उत्साह बरकरार

विक्रेताओं के अनुसार इस वर्ष पतंग और मांझे की कीमतों में 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है,फिर भी पतंगबाजों का उत्साह कम नहीं हुआ। बाजारों की भीड़ साफ संकेत दे रही है कि मकर संक्रांति के दिन जयपुर की छतों पर जबरदस्त मुकाबले होंगे और आसमान में गूंजेगा—“वो काटा… वो मारा…”।

जयपुर में मकर संक्रांति सिर्फ पर्व नहीं, बल्कि परंपरा, जुनून और कौशल का उत्सव है, जहां पारंपरिक मांझा और आधुनिक तकनीक मिलकर पतंगबाजी को और भी रोमांचक बना देती है।

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