जवाहर कला केन्द्र : महिला कलाकारों को समर्पित वागेश्वरी महोत्सव की शुरुआत

जयपुर। कैनवास पर रचनात्मक रंगों से साकार होती कल्पनाएं, चर्चा सत्रों में संवादों का सतत प्रवाह, सर्द शाम के साथ तत् वाद्य संतूर और अवनद्ध तबले की जुगलबंदी। जवाहर कला केन्द्र में शुक्रवार को विभिन्न कलाओं का ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिला। मौका था अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आयोजित ‘वागेश्वरी’ महोत्सव के पहले दिन का। प्रदेश की 10 महिला चित्रकार शिविर में मनोभाव को साकार कर रही हैं। देश की पहली महिला संतूर वादक डॉ. वर्षा अग्रवाल ने संतूर और तबला गर्ल रिम्पा शिवा ने तबला वादन की मनमोहक प्रस्तुति दी। तीन दिवसीय महोत्सव में देशभर की ख्यात महिला कलाकार दृश्य कला, साहित्य, संगीत और रंगमंच से जुड़ी प्रस्तुतियां देंगी।

कैनवास पर कल्पनाओं के रंग

अलंकार में महिला चित्रकार शिविर से वागेश्वरी महोत्सव की शुरुआत हुई। केन्द्र की अतिरिक्त महानिदेशक सुश्री प्रियंका जोधावत, वरिष्ठ लेखाधिकारी चेतन कुमार शर्मा और शिविर की क्यूरेटर डॉ. कृष्णा महावर ने कैनवास पर चित्र उकेर कर विधिवत उद्घाटन किया। प्रियंका जोधावत ने कहा कि तीन दिवसीय वागेश्वरी महोत्सव महिला कलाकारों की रचनात्मकता के रंगों से सराबोर रहेगा। इसमें अनुभवी कलाकारों के साथ युवाओं को भी अवसर प्रदान किया गया। डॉ. कृष्णा महावर ने बताया कि शिविर 12 मार्च तक चलेगा। जयपुर, बांसवाड़ा, कोटा और उदयपुर की 10 कंटेंपरेरी आर्टिस्ट इसमें हिस्सा ले रही हैं। इनमें डॉ. रेणु बारीवाल, शीतल चितलांगिया, प्रो. सीमा चतुर्वेदी, डॉ. मणि भारतीय, शर्मिला राठौड़, डॉ. निकहत तसनीम काजी, मीनू श्रीवास्तव, डॉ. दीपिका माली, तसलीम जमाल सोना, दीपाली शर्मा शामिल है। हर कलाकार की अपनी स्टाइल है जिसमें वे कैनवास पर अपनी कल्पनाओं के रंग भरेंगी। एब्स्ट्रेक्ट, आकृतिमूलक, मिक्स मीडियम, कोलाज आर्ट आदि स्टाइल की पेंटिंग्स उभर कर सामने आएंगी। इन पेंटिंग्स की शिविर के बाद प्रदर्शनी आयोजित की जाएगी।

‘वादन में महिला कलाकारों का अद्वितीय योगदान’

साहित्यिक आयोजन की कड़ी में ‘भारतीय शास्त्रीय संगीत में महिला वादकों का योगदान ‘पुरातन से नूतन’’ विषय पर प्रो. (डॉ.) वंदना कल्ला, डॉ. वंदना खुराना ने विचार साझा किए। डॉ. गायत्री शर्मा मॉडरेटर रहीं। राजस्थान विश्वविद्यालय के संगीत विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. वंदन कल्ला ने कहा कि राजस्थान में पाए गए प्राचीन भित्ति चित्रों में महिलाओं को वाद्य यंत्रों के साथ दर्शाया गया है इससे जाहिर है कि पुरातन काल से ही महिलाएं संगीत में अपनी सशक्त भूमिका निभा रही है। उन्होंने कहा कि चुनौतियां भले ही हो लेकिन महिला कलाकार वादन में योगदान देने में पीछे नहीं है, रुद्र वीणा जैसे मुश्किल माने जाने वाले वाद्य पर भी राधिका उमड़ेकर जैसी कलाकारों ने महारथ हासिल की है।

डॉ. वंदना खुराना ने बताया कि दक्षिण में संगीत जीवन का हिस्सा है, बच्चा चाहे किसी भी प्रोफेशन में हो लेकिन वह संगीत जरूर सीखता है। विशेषज्ञों ने शंकर गिटार वादक डॉ. कमला शंकर, सुर बहार वादक स्व. अन्नपूर्णा देवी, सरोद वादक स्व. शरण रानी, सितार वादक मंजू मेहता, प्रथम संतूर वादिका डॉ. वर्षा अग्रवाल और तबला वादक अब्बान ई मिस्त्री, अनुराधा पॉल, हेतल मेहता, रिम्पा शिवा की संगीत साधना पर भी प्रकाश डाला।

तबला और संतूर की अद्भुत जुगलबंदी

तबला और संतूर जैसे शास्त्रीय वाद्य यंत्रों के लालित्यपूर्ण प्रस्तुति से शुक्रवार की शाम सजी। रंगायन में तबला गर्ल के नाम से मशहूर कोलकाता की रिम्पा शिवा ने तबला वादन की प्रस्तुति दी। हारमोनियम पर राजेन्द्र बनर्जी की संगत के साथ रिम्पा ने तबले पर थिरकती अंगुलियों का करिश्मा दिखाया। रिम्पा ने तीन ताल में पेशकार, कायदा, रेला, चकरदार और गत पेश की। रिम्पा के पिता पं. स्वप्न शिवा प्रसिद्ध तबला गुरु हैं। रिम्पा ने बताया कि वे 5 वर्ष की उम्र से तबला वादन कर रही हैं। बचपन में पिता जब अपने शिष्यों को तबला सिखाते थे उससे प्रभावित होकर उन्होंने तबले के साथ अपनी संगीत साधना को आगे बढ़ाने का निर्णय किया। देश की प्रथम संतूर वादक का गौरव हासिल करने वाली डॉ. वर्षा अग्रवाल ने संतूर पर तान छेड़कर समां बांधा। रिम्पा ने तबले पर संगत की। वर्षा अग्रवाल की प्रस्तुति में गायकी अंग, तंत्रकारी और छंदकारी का समावेश सुनने को मिला।

उन्होंने गावती राग में आलाप, जोड़ आलाप, झाला के साथ प्रस्तुति शुरू की। विलंबित तीन ताल में गत, नोंक—झोंक पेश की। मध्य लय में गत, रूपक पेश करने के बाद द्रुत लय में गत के साथ उन्होंने समापन किया। राष्ट्रपति अवॉर्ड से सम्मानित डॉ. वर्षा अग्रवाल ने बताया कि वे झालावाड़ से ताल्लुक रखती हैं। वर्षा द्वारा संतूर को अपनाने के पीछे की भी रोचक कहानी है। उन्होंने बताया कि उनके पिता ने रेडियो पर बजते वाद्ययंत्र में से पसंदीदा वाद्य सिखाने का वादा किया था। वर्षा ने संतूर में रुचि जाहिर की। 8 साल की उम्र में उज्जैन जाकर उन्होंने कश्मीर के सुफियाना घराने के पं. ललित महंत और पं. भजन सोपोरी से शिक्षा हासिल की। 48 साल से संतूर वादन कर रही डॉ. वर्षा अग्रवाल 62 देशों में प्रस्तुति दे चुकी हैं। वे गायन की प्रो. हैं और राजस्थान की पहली महिला तबला वादक होने का गौरव भी उन्हें हासिल है।

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