जयपुर। गुलाबी नगरी शनिवार को सुहाग,श्रद्धा और लोक संस्कृति के अनूठे संगम से सराबोर नजर आई। चैत्र मास की रंगत के बीच ईसर-गणगौर का उल्लास अपने चरम पर रहा। 16 श्रृंगार में सजी धजी महिलाओं ने जब पारंपरिक वेशभूषा में सिर पर कलश धारण कर बाग-बगीचों से दूब और पुष्पों का अर्जन किया तो समूचा वातावरण ‘गोर-गोर गोमती, ईसर पूजे पार्वती…’ के मधुर लोकगीतों से गुंजायमान हो उठा।
अखंड सुहाग की कामना कर गीतों से किया अभिषेक
आस्था और श्रृंगार के इस महापर्व पर सुहागिन महिलाओं ने ईसर-गणगौर के समक्ष विधिवत पूजन कर पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मांगा। वहीं कुंवारी कन्याओं ने मनचाहे वर की कामना के साथ माता गौरी की आराधना की। दूब,जल और सुहाग सामग्री अर्पित करते हुए पारंपरिक गीतों के साथ गणगौर माता का अभिषेक किया गया। घर-घर में स्थापित ईसर-गौरा की प्रतिमाओं के समक्ष दीप-धूप और नैवेद्य के साथ श्रद्धा की महक बिखरी रही। उद्यापन करने वाली महिलाओं ने 16 सुहागिनों को भोजन कराकर और उपहार भेंट कर रीत निभाई।

रियासतकालीन वैभव और अटूट आस्था
जयपुर में गणगौर केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आमेर रियासत काल से चली आ रही एक भव्य ऐतिहासिक विरासत है। जयपुर के सोडाला की रहने वाली पूजा सैनी ने बताया कि होली के अगले दिन धूलंडी से शुरू होने वाला यह 16 दिवसीय पर्व हर दिन नए उत्साह के साथ मनाया जाता है। लोक परंपरा में ईसर और गणगौर को भगवान शिव और माता पार्वती का स्वरूप माना जाता है, जिनका पूजन दांपत्य सुख और प्रेम का प्रतीक है।
नवविवाहिताओं के लिए खास है सोलह श्रृंगार
इस पर्व को लेकर नवविवाहिताओं में विशेष उत्साह देखा गया। नवविवाहिता रेणू शर्मा के अनुसार 16 दिनों तक प्रतिदिन अलग-अलग परिधानों और श्रृंगार के साथ पूजन करना एक भावनात्मक और सांस्कृतिक अनुभव है। यह पर्व महिलाओं के जीवन में धार्मिक महत्व के साथ-साथ एक गहरी सामाजिक पहचान भी स्थापित करता है।
कई महिलाओं ने किया उद्यापन
राजधानी जयपुर में गणगौर पर्व धार्मिक मान्यता के अनुसार कई विवाहिताओं द्वारा उद्यापन किया। जहां महिलाओं ने घरों में 16 महिलाओं को बुलाकर घेवर, नुक्ती, गुलाब जामुन, आलू की सब्जी, पूड़ी, नमकीन और अन्य पकवान खिलाकर उपहार दिए।
सुहागिनों ने सास-ननद, जेठानी और विवाहिताओं को सुहाग की सामग्री भेंट की। महिलाओं ने ईसर-गणगौर को परम्परानुसार भोग लगा लगाया। वहीं उद्यापन नहीं करने वाली महिलाएं अपनी सासु मां को बयाना देकर आशीर्वाद लिया। शाम को सूर्यास्त से पहले गणगौर को पानी पिलाने के बाद जलाशयों, तालाब, कुओं में विसर्जित की गई। इसके साथ धुलंडी से शुरू हुई गणगौर पूजा संपन्न हुई।

गणगौर पूजन की अनूठी परंपरा
गणगौर पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सौभाग्य का प्रतीक है। इस अवसर पर कुंवारी कन्याएं और सुहागिन महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा और आभूषणों से सुसज्जित होकर सिर पर लोटा लेकर बाग-बगीचों में जाती हैं। वहां से ताजा जल भरकर उसमें हरी दूब और फूल सजाए जाते हैं और लोकगीत गाते हुए घर वापस लौटा जाता है।
घर पहुंचकर महिलाएं मिट्टी से बने ईसर-गौरा (भगवान शिव और माता पार्वती) की प्रतिमाओं तथा होली की राख से बनी आठ पिंडियों को दूब पर टोकरी में स्थापित करती हैं। इसके बाद ईसर-गौरा को सुंदर वस्त्र पहनाकर चंदन, अक्षत, धूप, दीप, पुष्प और सुहाग सामग्री अर्पित कर विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है।
पूरे 16 दिनों तक यह अनुष्ठान विशेष नियमों के साथ किया जाता है। इस दौरान महिलाएं दीवार पर रोली, मेहंदी, हल्दी और काजल से सोलह-सोलह बिंदियां लगाती हैं तथा दूब से 16 बार जल के छींटे देकर सोलह श्रृंगार के प्रतीकों की पूजा करती हैं।
पर्व का समापन गौर तृतीया के दिन व्रत रखकर और कथा श्रवण के साथ किया जाता है। इस दिन विशेष पूजा-अर्चना कर सुखी दांपत्य जीवन, अखंड सौभाग्य और मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना की जाती है।
सामूहिक गणगौर पूजन में गूंजे लोकगीत
गणगौर पर्व के तहत शहर के विभिन्न क्षेत्रों में सामूहिक पूजन के आयोजन हुए, जहां महिलाओं ने पारंपरिक उत्साह और श्रद्धा के साथ गणगौर माता की आराधना की।
पूजन के दौरान महिलाओं ने “भंवर म्हाने पूजण दे गणगौर…”, “गौर-गौर गोमती, ईसर पूजे पार्वती…” और “खोल ये गणगौर माता…” जैसे पारंपरिक लोकगीत गाकर माहौल को भक्तिमय बना दिया।
कई स्थानों पर महिलाएं ढोल-ढमाकों के साथ उद्यानों में ‘जैले’ लेने पहुंचीं। वहां से जल और पुष्प लेकर लौटी महिलाओं ने घरों और सामूहिक स्थलों पर ईसर-गौरा का विधि-विधान से पूजन किया।
पूरे आयोजन के दौरान पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाओं ने न केवल धार्मिक परंपरा का निर्वहन किया, बल्कि राजस्थान की समृद्ध लोक संस्कृति की भी झलक प्रस्तुत की।



















