June 23, 2024, 11:04 am
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विजय दशमी पर लोग करते हैं शस्त्र पूजा

जयपुर। राजस्थान सहित देशभर में दशहरे का त्यौहार अश्विन महीने की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दशहरा काफी हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने रावण का वध कर असत्य पर सत्य की विजय प्राप्त की थी। इसलिए इसे विजय दशमी भी कहा जाता है। इसी कड़ी में सभी जगहों पर दशहरा बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है जिसकी तैयारियों जोर शोर से शुरु हो गई हैं। विजय दशमी पर लोग शस्त्र पूजा भी करते है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन कोई भी कार्य आरम्भ करने से सफलता मिलती है। प्राचीन काल में भी राजा इस दिन विजय प्राप्ति की प्रार्थना करके रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। दशहरे का पर्व दस प्रकार के पापों काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद,मत्सर ,अहंकार,आलस्य,हिंसा और चोरी के परित्याग करने की सद प्रेरणा प्रदान करता है।

दशहरे पर दुर्गा पूजन करने का भी विशेष महत्व है। इसे आदि शक्ति पूजा पर्व भी कहा जाता है। विजय दशमी केवल भारत में ही नहीं देश के दूसरे देशों के कोने -कोने में भी मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के आधार पर विजय दशमी वाले दिन भगवान श्री राम ने दशानन का वध कर असत्य पर सत्य की विजय प्राप्त की थी। वही इस दिन विजय शक्ति दुर्गा मां की पूजा करने का विशेष महत्व है। विजय शक्ति के नाम से जाना जाता है। भगवान रामचंद्र ने चौदह वर्ष का वनवास भोगने के बाद रावण का वध किया और अयोध्या पहुंचे। पौराणिक मान्यताओं के आधार अश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय विजय नामक मुहूर्त होता है। यह काल सर्व कार्य सिद्धि दायक होता है। इसलिए भी इसे विजयादशमी कहते है।

इसलिए किया जाता है शमी पूजन

बताया जाता है कि दुर्याेधन ने पांडवों को जुए में पराजित करके बारह वर्ष का वनवास के साथ तेरहवें वर्ष में अज्ञातवास की शर्त दी थी। तेरहवें वर्ष यदि उनको पता लग जाता तो उन्हे पुनः बारह वर्ष का वनवास भोगना पड़ता। इसी अज्ञात वास में अर्जुन ने अपना धनुष एक शमी के वृक्ष पर रखा तथा स्वयं वृहन्नला वेश में राजा विराट के यहँ नौकरी कर ली थी। जब गोरक्षा के विराट के पुत्र उत्तर ने अर्जुन को अपने साथ लिया, तब अर्जुन ने शमी वृक्ष पर से अपने हथियार उठाकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी। विजयादशमी के दिन भगवान रामचंद्रजी के लंका पर चढ़ाई करने के लिए प्रस्थान करते समय शमी वृक्ष ने भगवान की विजय का उद्घोष किया था। विजयकाल में शमी पूजन इसीलिए होता है।

इस जगहों पर नहीं होता रावण दहन

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित गगोल गांव में दशहरा नहीं मनाया जाता है ,बताया जाता है कि यहां पर रावण का ससुराल था। मेरठ में प्राचीन मंदिर है बिल्वेश्वर नाथ मंदिर । इस मंदिर में त्रेतायुग में रावण की पत्नी मंदोदरी ने भगवान शिव की पूजा की थी और भगवान शिव ने प्रसन्न होकर बिल्वेश्वर नाथ मंदिर में ही उन्हे दर्शन दिए और वरदान मांगने के लिए कहा। मंदोदरी दानवों के राजा मय दानव की पुत्री थी। मंदोदरी ने भगवान शिव से वरदान मांगा कि उसका पति धरती पर सबसे बलशाली और विद्वान हो। इस मंदिर में ही पुलस्त्य मुनि का पौत्र और विश्रवा ऋषि का पुत्र रावण और मंदोदरी मिले। जिसके बाद दोनो की शादी हुई। इसलिए विजयादशमी के दिन यहां पर रावण नहीं जलाया जाता। बताया जाता है कि दशहरे वाले दिन इस गांव में मायूसी छाई रहती है। मान्यता है कि इस दिन गांव के लोग अपने-अपने घरों में चूल्हा तक नहीं जलाते है।

कई जगहों पर होता है मेलों का आयोजन

विजयदशमी के पर्व पर राजधानी जयपुर में अलग -अलग जगहों पर रावण दहन करने की परम्परा है। जिसके चलते कई जगहों पर मेलों का आयोजन किया जाता है।इन मेलों में रावण दहन के लिए मुख्य अतिथियों के रूप में फिल्मी कलाकारों सहित राजनेताओं को बुलाया जाता है। जिसमें कई तरह की स्वादिष्ट व्यंजनों की स्टॉल लगाई जाती है। मेलों में ऊचे-ऊचे झूले आकर्षण का केन्द्र होते है। बड़े-बड़े रावण मेलों में आने वाले लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करते हुए नजर आते है।

मेले में आने वाले रावणों की ऊचाई व आतिशबाजी के आधार पर मेला समिति को अवार्ड भी दिया जाता है। मेले में आने वाले रावण की ऊंचाई 70 फीट से शुरू होकर एक सौ 20 फीट तक की होती है। जयपुर में दशहरा मैदान, आदर्श नगर ,अरावली मार्ग मानसरोवर ,रामलीला मैदान राजा पार्क,दशहरा मैदान मालवीय नगर ,व राष्ट्रपति मैदान शास्त्री नगर में आयोजित किया जाता है।

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