जयपुर। गुलाबी नगरी के प्रसिद्ध श्री खोले के हनुमानजी मंदिर परिसर में आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा के आठवें दिन संत मुरलीधर महाराज ने भगवान श्रीराम द्वारा वानर वीरों और निषादराज को विदाई देने के प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। रामचरितमानस की चौपाइयों के माध्यम से उन्होंने प्रभु श्रीराम की उदारता, कृतज्ञता, मित्रता और भक्तवत्सलता का संदेश दिया।
संत मुरलीधर महाराज ने बताया कि लंका विजय में वानर वीरों ने अदम्य साहस और निष्ठा का परिचय दिया, वहीं निषादराज के साथ श्रीराम की मित्रता प्रेम, विश्वास और आत्मीयता का अनुपम उदाहरण है। प्रभु श्रीराम अपने सहयोगियों के योगदान और समर्पण को सदैव सम्मान देते हैं।
उन्होंने कहा कि सच्चा नेतृत्व वही है, जो साथ देने वालों के योगदान को पहचाने और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करे। विपरीत परिस्थितियों में साथ खड़े रहने वालों का सम्मान करना और उनके प्रति आभार रखना श्रीराम के चरित्र से मिलने वाली महत्वपूर्ण सीख है।
महाराज ने रामचरितमानस की चौपाइयों के माध्यम से प्रभु श्रीराम के भक्तवत्सल स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान अपने भक्तों के निष्काम सेवाभाव, प्रेम और समर्पण से प्रसन्न होते हैं। सच्ची भक्ति का आधार बाहरी वैभव नहीं, बल्कि हृदय की पवित्रता, विनम्रता और निस्वार्थ सेवा है।
उन्होंने कहा कि श्रीरामचरितमानस का प्रत्येक प्रसंग मानव जीवन को आदर्श दिशा प्रदान करता है। वानर वीरों और निषादराज की विदाई का प्रसंग सिखाता है कि सच्ची मित्रता स्वार्थ से परे होती है। सेवा, समर्पण, विनम्रता और परस्पर सम्मान जैसे गुणों को जीवन में अपनाकर रिश्तों को मजबूत बनाया जा सकता है।
कथा के आठवें दिन श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से भगवान श्रीराम के आदर्श चरित्र का श्रवण किया। संत मुरलीधर महाराज ने भक्तों से आह्वान किया कि वे पूजा-अर्चना के साथ अपने आचरण में भी प्रेम, विश्वास, कृतज्ञता और निस्वार्थ सेवा को स्थान दें।

















