साहब की आवाज और फोटो लगाकर ठग रहे हैं साइबर अपराधी

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जयपुर। राजस्थान पुलिस की साइबर क्राइम शाखा ने प्रदेश में तेजी से बढ़ रहे “इम्पर्सोनेशन फ्रॉड (पहचान चोरी) को लेकर एक विशेष एडवाइजरी जारी की है। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक साइबर क्राइम वी के सिंह के निर्देशानुसार विभाग ने आमजन और विशेषकर सरकारी व निजी विभागों के कर्मचारियों को सतर्क रहने को कहा है। साइबर अपराधी अब अधिकारियों के नाम और फोटो का सहारा लेकर डिजिटल ठगी के नए जाल बुन रहे हैं।

उप महानिरीक्षक पुलिस साइबर क्राइम शांतनु कुमार सिंह ने बताया कि अपराधी किसी भी वारदात से पहले पूरी रेकी करते हैं। वे विभाग की आधिकारिक वेबसाइट से अधिकारियों के नाम और पद निकालते हैं। इसके बाद लिंक्डइन और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से यह पता लगाते हैं कि कौन किसका जूनियर है और वर्तमान में विभाग में कौन सा प्रोजेक्ट चल रहा है। कई बार ये अपराधी विभागीय व्हाट्सएप ग्रुप्स में सेंध लगाकर सदस्यों की सूची भी चोरी कर लेते हैं।

शांतनु कुमार सिंह ने बताया कि साइबर ठग अब केवल मैसेज तक सीमित नहीं हैं, वे आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। किसी बड़े अधिकारी (जैसे डायरेक्टर, कमिश्नर या एमडी) की फोटो लगाकर नया व्हाट्सएप अकाउंट बनाया जाता है। अपराधी मैसेज करता है “मैं मीटिंग में हूँ, कॉल नहीं ले सकता, तुरंत कुछ गिफ्ट वाउचर्स या पैसे इस नंबर पर भेज दो।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए अपराधी आपके बॉस की आवाज की हूबहू नकल कर कॉल करते हैं, जिससे कर्मचारी को लगता है कि सच में साहब ही बोल रहे हैं। ईमेल एड्रेस बिल्कुल असली जैसा दिखता है, जिसमें केवल एक छोटे से अक्षर या डोमेन (जैसे .कॉम की जगह .इन-कॉम का अंतर होता है। रिश्तेदार के अस्पताल में होने का झांसा देकर तुरंत पैसों की मांग करना।

वहीं यदि किसी नए नंबर से अधिकारी के नाम पर मैसेज आए, तो तुरंत उनके पुराने या आधिकारिक नंबर पर कॉल करके पुष्टि करें। इंटरनेट से किसी की भी डीपी (प्रोफाइल पिक्चर) डाउनलोड करना आसान है। केवल फोटो देखकर भरोसा न करें।

ठग हमेशा ‘इमरजेंसी’ दिखाकर आपको सोचने का समय नहीं देते। किसी भी वित्तीय लेनदेन से पहले शांत रहें और अपने वरिष्ठों से चर्चा करें। अपना ओटीपी , बैंक विवरण या व्यक्तिगत जानकारी कभी भी व्हाट्सएप पर साझा न करें।

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