जयपुर। आयुर्वेद दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान (मानद विश्वविद्यालय), जयपुर में गुरुवार को ‘जीवनशैली गत विकारों में आयुर्वेद की भूमिका’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान और विश्व आयुर्वेद परिषद, राजस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यशाला में देशभर से आए आयुर्वेद विशेषज्ञों, चिकित्सकों और शोधकर्ताओं ने जीवनशैली से उत्पन्न विकारों के आयुर्वेदिक प्रबंधन पर मंथन किया।
इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान के कुलपति प्रो. संजीव शर्मा रहे, जबकि अध्यक्षता आयुर्वेद विश्वविद्यालय, जोधपुर के कुलगुरु प्रो. गोविंद सहाय शुक्ला ने की। सह आयोजन अध्यक्ष डॉ. सुमन शर्मा, विश्व आयुर्वेद परिषद के राष्ट्रीय सचिव डॉ. किशोरी लाल शर्मा, राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार शर्मा, प्रदेश महासचिव डॉ. पवन सिंह शेखावत और चिकित्सक प्रकोष्ठ के प्रदेश प्रभारी डॉ. जे.एस. राजावत ने भगवान धन्वंतरि की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलित कर कार्यशाला का शुभारंभ किया।
कुलपति प्रो. संजीव शर्मा ने कहा कि बदलती जीवनशैली ने ऐसे कई विकारों को जन्म दिया है, जो लंबे समय तक व्यक्ति के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। आयुर्वेद केवल रोग उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य संरक्षण, रोग की रोकथाम और जीवनशैली में सुधार का भी विज्ञान है। ऐसे में जीवनशैली विकारों के स्थायी और समग्र समाधान में आयुर्वेद की भूमिका महत्वपूर्ण है।
अध्यक्षता कर रहे प्रो. गोविंद सहाय शुक्ला ने कहा कि आयुर्वेद रोग के साथ रोगी को समझने की दृष्टि देता है। जीवनशैली विकारों की बढ़ती चुनौती के बीच आयुर्वेद के सिद्धांतों को आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़कर जनस्वास्थ्य के प्रभावी मॉडल विकसित करने की आवश्यकता है।
सह आयोजन अध्यक्ष डॉ. सुमन शर्मा ने महिलाओं में बढ़ रहे पीसीओडी, बंध्यत्व और अन्य हार्मोनल एवं जीवनशैली संबंधी विकारों का उल्लेख करते हुए कहा कि आयुर्वेद की आहार-विहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या और पंचकर्म आधारित दृष्टि रोग के मूल कारणों पर काम करने का अवसर प्रदान करती है।
कार्यशाला के प्रथम दिन प्रख्यात विशेषज्ञ डॉ. नारायण साहने और प्रो. के. भारती ने पीसीओडी, बंध्यत्व, मूत्रजनित विकारों सहित विभिन्न जीवनशैली संबंधी विकारों के आयुर्वेदिक प्रबंधन पर व्याख्यान दिए। विशेषज्ञों ने आहार-विहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या, पंचकर्म और अन्य आयुर्वेदिक उपचार पद्धतियों के माध्यम से इन विकारों के समग्र प्रबंधन की संभावनाओं पर चर्चा की।



















