जयपुर। जगद्गुरु आश्रम में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया गया। भगवान श्रीराम के जन्म प्रसंग के दौरान ‘भये प्रगट कृपाला दीन दयाला’ की चौपाई गूंजते ही पांडाल जय श्रीराम के जयकारों से गूंज उठा। कथा व्यास विद्यासागर महाराज ने कहा कि भगवान श्रीराम का जीवन मर्यादा, त्याग और आदर्श का प्रतीक है।
श्रीकृष्ण जन्म प्रसंग शुरू होते ही वातावरण कृष्णमय हो गया। ‘नंद घर आनंद भयो’ भजन पर श्रद्धालु झूम उठे। भगवान के बाल स्वरूप का श्रृंगार कर उन्हें पालने में झुलाया गया और श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर जन्मोत्सव की बधाइयां दीं। संगीतकारों ने मंगल गीत और बधाइयां प्रस्तुत कीं। आश्रम परिसर में विशेष गुब्बारा सजावट भी की गई।
कथा व्यास विद्यासागर महाराज ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा आध्यात्मिक अनुष्ठान है, इसे मनोरंजन या धन कमाने का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कथा के दौरान विभिन्न देवी-देवताओं के स्वरूप बनाकर उनसे पूजा करवाना और धन चढ़वाना कथा के व्यावसायीकरण की ओर ले जाता है।
उनके अनुसार कथा पंडाल में अभद्र तरीके से नाच-गान करना भी व्यासपीठ और अध्यात्म की गरिमा के अनुरूप नहीं है। कथा का मूल स्वरूप शुकदेव जी द्वारा राजा परीक्षित को सुनाई गई भागवत परंपरा के अनुरूप होना चाहिए।
महाराज ने तुलसी-शालिग्राम विवाह को श्रेष्ठ बताते हुए कहा कि शालिग्राम भगवान विष्णु का स्वरूप हैं और तुलसी को उनकी अर्धांगिनी माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार तुलसी-शालिग्राम विवाह कराने से कन्यादान के समान पुण्य प्राप्त होता है।
उन्होंने कहा कि रुक्मणी विवाह भगवान श्रीकृष्ण और देवी रुक्मणी के दिव्य प्रसंग को दर्शाता है, लेकिन वर्तमान में कुछ आयोजनों में भक्ति के स्थान पर फिल्मी गीत, अत्यधिक शोर और अभद्र नृत्य जैसी प्रवृत्तियां देखने को मिल रही हैं। इससे कथा की आध्यात्मिक भावना प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि धार्मिक आयोजनों में मर्यादा और सात्विकता बनाए रखना जरूरी है तथा धर्म-अध्यात्म में बढ़ रही विकृतियों को रोकना सभी की जिम्मेदारी है।



















