अमृत पीवो सदा चिर जीवो के जयकारों से गूंजे गुरुद्वारे

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जयपुर। गुलाबी नगरी के गुरुद्वारों में मंगलवार को ‘खालसा मेरो रूप है खास’ की भावना के साथ बैसाखी का पर्व हर्षोल्लास से मनाया गया। वर्ष 1699 में गुरु गोविंद सिंह द्वारा आनंदपुर साहिब में की गई खालसा पंथ की स्थापना की याद में शहर के सभी प्रमुख गुरुद्वारों में विशेष दीवान सजाए गए, जहाँ कीर्तन और गुरुमत विचारों के जरिए संगत निहाल हुई।

हीदा की मोरी: शबद कीर्तन से झूम उठी संगत

गुरुद्वारा हीदा की मोरी में सुबह सहज पाठ के भोग डाले गए। प्रधान सरदार सुच्चा सिंह ने बताया कि हजूरी रागी भाई संदीप सिंह ने “अमृत पीवो सदा चिर जीवो” और “राखो सरणाई, गुरु रामदास राखो सरणाई” जैसे शबद गाकर आध्यात्मिक माहौल बना दिया। कार्यक्रम के पश्चात गुरु का अटूट लंगर वरताया गया।

वैशाली नगर: अमृत संचार और ढाडी जत्थे ने सुनाया इतिहास

गुरुद्वारा वैशाली नगर में तीन दिवसीय समागम का समापन हुआ। प्रधान सरदार सर्वजीत सिंह मखीजा ने बताया कि बैसाखी के उपलक्ष्य में सोमवार को 20 श्रद्धालुओं को अमृत संचार (दीक्षा) करवाया गया। मंगलवार सुबह दरबार साहिब (अमृतसर) के हजूरी रागी भाई जतिंदर सिंह ने ‘आसा दी वार’ का पाठ किया।

फतेहगढ़ साहिब से आए सिंह साहिब ज्ञानी करनवीर सिंह ने कथा के माध्यम से पंज प्यारों के बलिदान और खालसा सृजना के गौरवशाली इतिहास पर प्रकाश डाला। वहीं, ढाडी जत्था भाई देसा सिंह दलेर ने वीर रस की कविताओं से 1699 के आनंदपुर साहिब के दृश्यों को जीवंत कर दिया। भाई रविंदर सिंह राज ने भी कीर्तन के जरिए हाजिरी भरी।

नेहरू नगर: दरबार साहिब के रागियों ने बिखेरी स्वर लहरियां

गुरुद्वारा नेहरू नगर (पानी पेच, बनीपार्क) में भी पर्व धूमधाम से मनाया गया। प्रधान सरदार हरचरण सिंह ने बताया कि सुबह भाई गुरमीत सिंह ने आसा दी वार का पाठ किया। यहाँ दरबार साहिब के हजूरी रागी भाई जतिंदर सिंह और भाई रविंदर सिंह राज के कीर्तन श्रवण करने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़े। अंत में सभी गुरुद्वारों में संगत ने लंगर छका।

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