जयपुर। गलता गेट स्थित गीता गायत्री मंदिर में पंडित राजकुमार चतुर्वेदी के सानिध्य में चल रही पुरुषोत्तम मास की दिव्य एवं भव्य रामकथा में शुक्रवार को व्यासपीठ से देवाचार्य जी महाराज ने भरत जी के अद्वितीय त्याग, प्रेम और धर्मनिष्ठा का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा श्रवण कर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।
देवाचार्य महाराज ने कहा कि भरत जी ने राजपाट का त्याग कर प्रभु श्रीराम की चरण पादुकाओं को मस्तक पर धारण किया और स्वयं वनवासी जीवन अपनाकर नगर के बाहर रहकर राज्य संचालन किया। उन्होंने इसे त्याग, प्रेम और समर्पण का अनुपम उदाहरण बताते हुए कहा कि वर्तमान समय में इसी भावना की सबसे अधिक आवश्यकता है, क्योंकि आज भाई-भाई के प्रेम में दूरियां बढ़ती जा रही हैं।
उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम की कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि जीवन का आदर्श और यथार्थ है, जो त्याग, कर्तव्य और प्रेम का मार्ग दिखाती है। प्रभु श्रीराम ने पिता के वचन की मर्यादा के लिए राजसुखों का त्याग किया, वहीं माता सीता और लक्ष्मण जी ने प्रेम और कर्तव्य भावना से वनवास स्वीकार किया। दूसरी ओर भरत जी ने राजगद्दी को अस्वीकार कर तपस्वी की भांति जीवन व्यतीत करते हुए धर्मपूर्वक राज्य का पालन किया।
मंदिर प्रवक्ता नीतीश चैतन्य चतुर्वेदी ने कहा कि सच्चा प्रेम ही वास्तविक त्याग है। जहां प्रेम होता है, वहां अहंकार, स्वार्थ और अधिकार की भावना स्वतः समाप्त हो जाती है। रामकथा हमें प्रेम, मर्यादा और त्याग को जीवन में अपनाने का संदेश देती है, जिससे परिवार और समाज में सुख एवं शांति स्थापित हो सकती है।
कथा में घाट बालाजी सुदर्शन आचार्य महाराज, संयुक्त भारतीय धर्म संसद के अध्यक्ष आचार्य राजेश्वर जी, भागवत आचार्य गोपाल शरण जी महाराज, प्राचीन श्याम मंदिर कावटिया के लोकेश जी महाराज, समाजसेवी सुरेश मिश्रा, सुदीप तिवारी, प्रहलाद सिंह, विष्णु शर्मा सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे। आयोजकों ने बताया कि शनिवार को राजा रामचंद्र जी के राज्याभिषेक के साथ भव्य एवं दिव्य रामकथा का समापन होगा।



















