मुंबई। मुंबई के पवई स्थित चंद्रभान शर्मा कॉलेज (स्वायत्त) में आयोजित 11वां अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन केवल एक शैक्षणिक आयोजन नहीं, बल्कि परंपरा और आधुनिकता के बीच संवाद का जीवंत मंच बनकर उभरा। “आईकेएस: ब्रिजिंग ट्रेडिशन, इनोवेशन एंड सस्टेनेबिलिटी” विषय पर केंद्रित इस सम्मेलन ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय ज्ञान प्रणालियां आज भी वैश्विक परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिक हैं।
मुंबई विश्वविद्यालय और आईसीएफएआई फाउंडेशन फॉर हायर एजुकेशन के सहयोग से आयोजित इस सम्मेलन में देश-विदेश के विद्वानों, शोधकर्ताओं और छात्रों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। उद्घाटन सत्र में प्रभारी प्राचार्या डॉ. वैशाली राजपूत ने भारतीय परंपराओं को ज्ञान का अमूल्य स्रोत बताते हुए उनका समकालीन महत्व रेखांकित किया। वहीं, मुख्य अतिथि डॉ. राजन वेलुकर ने युवाओं के लिए तकनीकी दक्षता के साथ आयुर्वेद, योग और वैदिक ज्ञान की समझ को आवश्यक बताया।
सम्मेलन के दौरान आयोजित तकनीकी सत्रों में सतत विकास, नवाचार और सांस्कृतिक विरासत जैसे विषयों पर गहन चर्चा हुई। आईआईटी बॉम्बे के प्रो. डॉ. वरदराज बापट सहित कई विशेषज्ञों ने भारतीय ज्ञान प्रणालियों की वैज्ञानिकता और व्यावहारिक उपयोगिता पर प्रकाश डाला। अंतरराष्ट्रीय वक्ता आलोक गुप्ता ने वैश्विक कार्यप्रणालियों में भारतीय दर्शन के बढ़ते प्रभाव को रेखांकित किया।
सम्मेलन में प्राप्त 104 शोध पत्रों में से 85 का चयन यह दर्शाता है कि इस क्षेत्र में अकादमिक रुचि तेजी से बढ़ रही है। समापन सत्र में विरासत आधारित शोध की आवश्यकता पर बल दिया गया। यह सम्मेलन इस संदेश के साथ संपन्न हुआ कि भारतीय ज्ञान प्रणालियां केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि एक संतुलित, समावेशी और सतत भविष्य की मजबूत नींव भी हैं।
(अनिल बेदाग)




















