
जयपुर। वर्ष 1947 में देश के विभाजन ने केवल भारत और पाकिस्तान के बीच एक सरहद ही नहीं खींची,बल्कि लाखों परिवारों को हमेशा के लिए बिखेर दिया। उस त्रासदी को अपनी आंखों से देखने वाले जयपुर निवासी श्याम धवन ने अपने बेटे विक्रम धवन के साथ विशेष बातचीत में विभाजन के दौरान झेली भयावह परिस्थितियों और उससे मिली जीवन की सीख को साझा किया।
ट्रेन की खिड़की के छेद से देखा मौत का तांडव
श्याम धवन ने बताया कि वे उस समय महज 11 वर्ष के थे। जब पेशावर से दिल्ली के लिए निकली ट्रेन में सवार हुए। उन्होंने कहा कि ट्रेन चलने के बाद कुछ देर तक सन्नाटा रहा,लेकिन जल्द ही वह चीख-पुकार में बदल गया।
उन्होंने बोगी के एक छोटे से छेद से देखा कि बाहर लोग तलवारें और धारदार हथियार लेकर घूम रहे थे। हमारे डिब्बे में छह सरदार सहयात्री थे, जो कृपाण लेकर दरवाजे पर डट गए। वहीं मेरे अंकल के पास रिवॉल्वर थी। इसी वजह से हमारा डिब्बा सुरक्षित रहा, लेकिन ट्रेन की छत पर बैठे लोगों की चीखें आज भी कानों में गूंजती हैं।”
उन्होंने बताया कि अमृतसर पहुंचने पर स्वर्ण मंदिर के स्वयंसेवकों ने शरणार्थियों को दूध और भोजन उपलब्ध कराया, जिससे भय और निराशा के बीच उन्हें नया संबल मिला।
‘हम अपने साथ उम्मीद और आत्मविश्वास लेकर आए’
विभाजन के दौरान क्या छूट गया, इस सवाल पर श्याम धवन ने भावुक होते हुए कहा कि बचपन की गलियां, घर और यादें पीछे छूट गईं। उन्होंने कहा, “जब लोग पूछते हैं कि पाकिस्तान से क्या लेकर आए, तो मेरा जवाब होता है कि हम अपने साथ उम्मीद और आत्मविश्वास लेकर आए थे। हमने तय कर लिया था कि हर कठिनाई का सामना करेंगे और नई जिंदगी बनाएंगे।”
उन्होंने कहा कि वे नफरत को सीमा पार ही छोड़ आए थे। “नफरत पालने से घाव कभी नहीं भरते। हम अपने साथ केवल प्यार लेकर आए हैं।”
अगली पीढ़ी को दी देशप्रेम और सद्भाव की सीख
श्याम धवन के बेटे विक्रम धवन ने बताया कि इतनी बड़ी त्रासदी और कत्लेआम देखने के बावजूद उनके माता-पिता ने कभी घर के माहौल में कटुता या कट्टरता को जगह नहीं दी।
उन्होंने कहा, “माता-पिता ने हमें विभाजन की कहानियां जरूर सुनाईं, लेकिन हमेशा यही सिखाया कि अतीत का बोझ अगली पीढ़ी पर मत डालो। उन्होंने हमें बताया कि मजहब और जाति से पहले हम सभी भारतीय हैं।”
विक्रम ने कहा कि उनके परिवार का मूल मंत्र हमेशा अतीत की पीड़ा को पीछे छोड़कर भविष्य की ओर सकारात्मक सोच के साथ बढ़ना रहा है।
श्याम धवन की यह कहानी केवल विभाजन की त्रासदी का दस्तावेज नहीं, बल्कि इंसानी जज्बे, सकारात्मक सोच, साहस और उम्मीद की ऐसी सच्ची मिसाल है, जो आज की पीढ़ी को विपरीत परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने और प्रेम, सद्भाव तथा राष्ट्रप्रेम के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देती है।
















