राजस्थान पुलिस अकादमी में राज्य स्तरीय संगोष्ठी: नए आपराधिक कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन और वैज्ञानिक अनुसंधान पर हुआ मंथन

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जयपुर। प्रभावी और त्वरित न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाने के उद्देश्य से राजस्थान पुलिस अकादमी में शनिवार को “प्रभावशाली न्याय वितरण के लिए अंतर-संस्थागत समन्वय” विषय पर एक दिवसीय राज्य स्तरीय संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी में प्रदेशभर से न्यायपालिका, पुलिस, अभियोजन और विधि-विज्ञान (फोरेंसिक) संस्थानों के 114 प्रतिनिधियों ने भाग लेकर आपराधिक न्याय प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत चर्चा की।

राजस्थान पुलिस अकादमी के मुख्य सभागार में आयोजित कार्यक्रम का उद्देश्य आपराधिक न्याय प्रशासन से जुड़े प्रमुख विभागों के बीच समन्वय बढ़ाना, साक्ष्य प्रबंधन को मजबूत करना, अदालतों की अपेक्षाओं के अनुरूप अनुसंधान की गुणवत्ता सुधारना तथा मुकदमों के त्वरित निस्तारण के लिए साझा रणनीति तैयार करना रहा।

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए राजस्थान पुलिस अकादमी के निदेशक एवं अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस संजीब कुमार नार्जरी ने कहा कि भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम जैसे नए आपराधिक कानूनों का प्रभावी और पारदर्शी क्रियान्वयन तभी संभव है, जब न्यायपालिका, पुलिस, अभियोजन और फोरेंसिक संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय हो। उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान, डिजिटल साक्ष्य प्रबंधन तथा इंटरऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (आईसीजेएस) के अधिकाधिक उपयोग पर बल देते हुए पीड़ितों को समयबद्ध न्याय उपलब्ध कराने की आवश्यकता बताई।

अकादमी के अतिरिक्त निदेशक ने समन और वारंट की समय पर तामील, स्थानांतरित अनुसंधान अधिकारियों की न्यायालय में उपस्थिति, फोरेंसिक रिपोर्टों में देरी तथा प्रक्रियागत कमियों को दूर करने के लिए मानक कार्यप्रणाली (एसओपी) तैयार करने पर जोर दिया।
संगोष्ठी के दौरान तीन विषयगत सत्र आयोजित किए गए। पहले सत्र में राजस्थान स्टेट कोऑपरेटिव ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष अनिल कौशिक, अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस एस. सेंगाथिर तथा एडीपी सुदेश कुमार सत्तवान ने न्यायालय की अपेक्षाओं और आरोप-पत्र दाखिल करने से पहले अभियोजन पक्ष की समीक्षा प्रक्रिया पर विस्तार से विचार रखे।

दूसरे सत्र में कोटपूतली-बहरोड़ के जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि शर्मा, अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस विजय कुमार सिंह तथा एडीपी अमित जोशी ने अनुसंधान में होने वाली देरी, कमजोर साक्ष्यों, प्रक्रियागत त्रुटियों और आरोपियों के बरी होने के कारणों का विश्लेषण करते हुए साझा डिजिटल मंच विकसित करने की आवश्यकता बताई।

तीसरे सत्र में जयपुर जेडीए के जिला एवं सत्र न्यायाधीश महावीर प्रसाद गुप्ता, अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस (अपराध) बिपिन कुमार पाण्डेय तथा पीओ पंकज शर्मा ने इलेक्ट्रॉनिक एवं डिजिटल साक्ष्यों के विधिसम्मत संकलन, चेन ऑफ कस्टडी की सुरक्षा, केस डायरी लेखन और डिजिटल सत्यापन की प्रक्रिया पर मार्गदर्शन दिया।

संगोष्ठी में पुलिस अनुसंधान की गुणवत्ता सुधारने के लिए 12-सूत्रीय एजेंडा भी प्रस्तुत किया गया। इसमें समयबद्ध अनुसंधान, आरोप-पत्र से पूर्व विधिक परामर्श, फोरेंसिक समन्वय, समन-वारंट की तकनीकी तामील, न्यायालयीन उपस्थिति प्रबंधन, साक्ष्य की अखंडता, संयुक्त त्रुटि निवारण, दोषमुक्ति मामलों का विश्लेषण, संस्थागत जवाबदेही और मैदानी अनुभवों से सीख जैसे बिंदुओं को प्रमुखता दी गई।

समापन सत्र में सभी सहभागी विभागों ने इस बात पर सहमति जताई कि त्वरित, निष्पक्ष और विश्वसनीय न्याय सुनिश्चित करना किसी एक एजेंसी का नहीं, बल्कि पूरी न्याय प्रणाली का साझा दायित्व है। इसके लिए जांच अधिकारियों के नियमित प्रशिक्षण, फोरेंसिक विशेषज्ञों की समयबद्ध सहायता तथा अंतर-विभागीय समीक्षा बैठकों को निरंतर आयोजित किए जाने पर जोर दिया गया।

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