जयपुर। पितृपक्ष में पितरों की तृप्ति के लिए श्रद्धालु तर्पण, पिंडदान और अन्नदान कर रहे हैं। वहीं, जो लोग विधि-विधान से श्राद्ध करने में सक्षम नहीं हैं, उनके लिए भी धर्मग्रंथों में सरल विकल्प बताए गए हैं। पंडित बनवारी लाल शर्मा के अनुसार सामर्थ्य के अनुसार श्रद्धा से किया गया तर्पण और दान भी पितरों के प्रति श्रद्धा का माध्यम है।
उन्होंने बताया कि गया, पुष्कर, हरिद्वार-कनखल, बद्रीनाथ, प्रयागराज और काशी जैसे तीर्थों में श्राद्ध का विधान है। वहां जाना संभव न हो तो नदी, तालाब या कुएं के जल से तर्पण किया जा सकता है। भोजन कराने में असमर्थ होने पर यथाशक्ति अन्नदान, कच्चा धान ब्राह्मण को देना, तिल अर्पित करना या तिल मिश्रित जल से पितरों को जलांजलि देने का विधान बताया गया है। गाय को चारा खिलाना भी श्राद्ध के विकल्पों में शामिल है।
धन या सामग्री का अभाव हो तो आटा, शाक-पात अथवा यथाशक्ति दक्षिणा देने का भी उल्लेख मिलता है। इनमें से कुछ भी संभव न हो तो वृक्ष के समीप जाकर पितरों से श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करने का विधान बताया गया है।
डॉ. मिश्रा के अनुसार गोभिल स्मृति में कम सामर्थ्य वाले व्यक्ति के लिए कुश से निर्मित वटु की आकृति पर नैवेद्य अर्पित कर पार्वण श्राद्ध का उल्लेख है। स्कंद पुराण में भी प्रवास, यात्रा, आपत्ति, द्रव्याभाव या रुग्णावस्था में उपलब्ध सामग्री से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने की बात कही गई है।
राम ने भी वनवास में किया था श्राद्ध
रामायण के अयोध्याकांड में दंडकारण्य में निवास के दौरान भगवान राम द्वारा इंगुदी, बेर और बेल से पितरों का श्राद्ध करने का उल्लेख मिलता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इससे संदेश मिलता है कि श्राद्ध में सामग्री से अधिक श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार किया गया समर्पण महत्वपूर्ण है। धर्मग्रंथों में व्यक्ति को अपनी शक्ति के अनुसार शाक-पात से भी श्राद्ध करने की बात कही गई है।



















