अहोई अष्टमी पर बन रहा रवि पुष्य और सर्वार्थ सिद्धि योग का दुर्लभ संयोग

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A rare alignment of Ravi Pushya Yoga and Sarvartha Siddhi Yoga is forming on Ahoi Ashtami.
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जयपुर। जयपुर सहित पूरे देश में अहोई अष्टमी का पावन पर्व रविवार, 1 नवंबर को अपार श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। इस वर्ष अहोई अष्टमी का व्रत बेहद खास और मंगलकारी संयोग में आ रहा है। इस दिन ‘रवि पुष्य नक्षत्र’ और ‘सर्वार्थ सिद्धि योग’ का अद्भुत मिलन हो रहा है, जो धार्मिक अनुष्ठानों, शुभ संकल्पों और पूजा-अर्चना के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है।

गोविंद देवजी मंदिर में निशुल्क पंच कुंडीय महायज्ञ

अहोई अष्टमी के पावन अवसर पर गुलाबी नगरी के आराध्य देव श्री गोविंद देवजी मंदिर में संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना को लेकर विशेष धार्मिक आयोजन होंगे। मंदिर महंत अंजन कुमार गोस्वामी महाराज के पावन सानिध्य में प्रात: 8 से 10 बजे तक निशुल्क पंच कुंडीय गायत्री महायज्ञ का आयोजन किया जाएगा।

गायत्री परिवार के आचार्यों के निर्देशन में संपन्न होने वाले इस महायज्ञ में कोई भी श्रद्धालु भाग ले सकता है। इसके लिए श्रद्धालुओं को अपने साथ कोई भी पूजन सामग्री लाने की आवश्यकता नहीं है। यज्ञ के दौरान ही जन्मदिन और विवाह वर्षगांठ जैसे मांगलिक संस्कार भी संपन्न कराए जाएंगे।

पंचांग के अनुसार, कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 1 नवंबर को दोपहर 2:51 बजे प्रारंभ होगी और 2 नवंबर को दोपहर 1:10 बजे समाप्त होगी। उदयकालिक तिथि और सनातन परंपरा के अनुसार अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर को ही रखा जाएगा।

ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार इस दिन चंद्रमा अपनी स्वराशि ‘कर्क’ में विराजमान रहेंगे। चंद्रमा को मन, मातृत्व और भावनाओं का कारक ग्रह माना जाता है। कर्क राशि में चंद्रमा का प्रवेश पारिवारिक स्नेह, संवेदनशीलता और संतान के प्रति अपार प्रेम को मजबूत करता है। इसके अतिरिक्त, सूर्य और शुक्र दोनों ही तुला राशि में स्थित रहेंगे, जिससे संबंधों में सौहार्द, सामंजस्य और मिठास में वृद्धि होगी।

अहोई अष्टमी का व्रत विशेष रूप से माताएं अपनी संतान के कल्याण और मंगल जीवन के लिए रखती हैं। व्रत की शुरुआत सुबह स्नान ध्यान के बाद संतान की सुरक्षा व समृद्धि के संकल्प के साथ होगी।

दिनभर निर्जला या फलाहारी व्रत रखने के बाद शाम को माताएं अहोई माता का चित्र या दीवार पर आकृति बनाकर स्थापना करेंगी। इसके बाद रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और विशेष नैवेद्य अर्पित कर अहोई माता की विधि-विधान से पूजा की जाएगी। पूजा के पश्चात अहोई अष्टमी की पौराणिक कथा सुनी जाएगी और अंत में आसमान में तारों को अर्घ्य देकर माताएं अपनी संतान की दीर्घायु की प्रार्थना करेंगी तथा परिवार की परंपरा अनुसार व्रत का पारण करेंगी।

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