चातुर्मास 25 जुलाई से शुरू: चार माह तक थमेंगे मांगलिक कार्य

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Chaturmas begins on July 25.
Chaturmas begins on July 25.

जयपुर। आषाढ़ शुक्ल एकादशी पर 25 जुलाई से चातुर्मास प्रारंभ होने जा रहे । इसके साथ ही अगले चार माह तक विवाह,गृह प्रवेश, मुंडन, उपनयन और अन्य अधिकांश मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाएगा। चातुर्मास शुरू होने से पहले 22 जुलाई को बड़ल्या नवमी और 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी स्वयं सिद्ध अबूझ मुहूर्त होने के कारण इन दोनों दिनों शहर सहित प्रदेशभर में हजारों विवाह और अन्य शुभ संस्कार संपन्न होंगे।

पंडित बनवारी लाल शर्मा ने बताया कि बड़ल्या नवमी और देवशयनी एकादशी दोनों ही स्वयं सिद्ध अबूझ मुहूर्त हैं। इन तिथियों पर पंचांग के अनुसार अलग से शुभ मुहूर्त निकालने की आवश्यकता नहीं होती। यही कारण है कि लोग विवाह,सगाई,गृह प्रवेश,यज्ञोपवीत, प्रतिष्ठा और अन्य शुभ कार्यों के लिए इन तिथियों को प्राथमिकता देते हैं।

देवशयनी एकादशी से शुरू होगा चातुर्मास

धार्मिक मान्यता के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद चार माह तक वे विश्राम करते हैं। इस अवधि को चातुर्मास कहा जाता है। भगवान विष्णु के शयन काल में विवाह और अन्य मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। इस दौरान जप, तप, दान, धर्म और पूजा-अर्चना का विशेष महत्व माना गया है। मान्यता है कि इस काल में किए गए धार्मिक कार्यों का सहस्र गुना फल प्राप्त होता है। जैन परंपरा में भी चातुर्मास का विशेष महत्व है और इस दौरान साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर साधना एवं प्रवचन करते हैं।

चातुर्मास में शिव आराधना का विशेष महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु के योगनिद्रा में रहने के दौरान सृष्टि के संचालन की जिम्मेदारी भगवान शिव संभालते हैं। इसी कारण चातुर्मास में शिव उपासना का विशेष महत्व माना गया है। सावन और भाद्रपद जैसे पवित्र माह भी इसी अवधि में आते हैं, जिनमें रुद्राभिषेक, जलाभिषेक, सोमवार व्रत और शिव मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

शर्मा के अनुसार पहला माह सावन भगवान भोलेनाथ को समर्पित रहता है। इसके बाद भाद्रपद में भगवान गणेश का जन्मोत्सव मनाया जाता है और फिर शारदीय नवरात्र का पर्व आता है। इस पूरे काल में देवी-देवताओं की आराधना का विशेष महत्व रहता है।

साधना,संयम और धर्म पालन का काल

चातुर्मास को आध्यात्मिक साधना, संयम और आत्मशुद्धि का सर्वोत्तम समय माना जाता है। इस दौरान संत-महात्मा एक ही स्थान पर रहकर प्रवचन, सत्संग और धर्म प्रचार करते हैं। अनेक श्रद्धालु भी व्रत, उपवास और विशेष धार्मिक संकल्प लेकर जीवन में संयम का पालन करते हैं।
चातुर्मास का समापन कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवउठनी एकादशी पर होगा। इसी दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागेंगे और इसके साथ ही विवाह सहित सभी मांगलिक कार्यों का शुभारंभ फिर से हो जाएगा।

चातुर्मास में इन चीजों का रखा जाता है परहेज

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चातुर्मास में खानपान और दिनचर्या में भी विशेष संयम रखा जाता है। सावन में हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे पालक, मेथी, चौलाई और सरसों का सेवन वर्जित माना गया है। वर्षा ऋतु में इनमें सूक्ष्म जीवों की संभावना अधिक होने के कारण भी इनसे परहेज किया जाता है। भाद्रपद में दही का सेवन त्याज्य माना गया है। इसके अलावा लहसुन, प्याज, शराब और अन्य नशीले पदार्थों से भी दूर रहने की परंपरा है।

प्रकृति और धर्म का अनूठा समन्वय

चातुर्मास वर्षा ऋतु में आता है। प्राचीन समय में लगातार वर्षा के कारण ऋषि-मुनि यात्राएं नहीं करते थे और एक स्थान पर रहकर लोगों को धर्म, संस्कार और जीवन मूल्यों का ज्ञान देते थे। यही परंपरा आगे चलकर चातुर्मास के रूप में स्थापित हुई। आज भी इसे केवल धार्मिक अनुष्ठानों का नहीं, बल्कि आत्मसंयम, सेवा, सदाचार और आध्यात्मिक उन्नति का विशेष काल माना जाता है।

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