75 किमी की आस्था यात्रा पूरी: डिग्गीपुरी दरबार में उमड़ा भक्तों का सैलाब

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75-km pilgrimage of faith concludes: Sea of ​​devotees surges at Diggipuri Darbar.
75-km pilgrimage of faith concludes: Sea of ​​devotees surges at Diggipuri Darbar.

जयपुर। राजस्थान की प्रसिद्ध श्री कल्याण डिग्गीपुरी की 61वीं लक्खी पदयात्रा शनिवार को भगवान श्री कल्याणजी महाराज के धाम डिग्गीपुरी पहुंचने के साथ ही भक्ति भाव और हर्षोल्लास के साथ संपन्न हो गई। पांच दिनों में लगभग 75 किलोमीटर की कठिन और भक्तिमय पैदल यात्रा तय कर लाखों श्रद्धालुओं ने डिग्गीपुरी दरबार में अपनी हाजिरी लगाई और मनवांछित फल की कामना की।

राजधानी जयपुर के चौड़ा रास्ता स्थित ताड़केश्वर महादेव मंदिर से मुख्य केसरिया ध्वज (निशान) की पूजा-अर्चना के साथ शुरू हुई यह पदयात्रा पूरे मार्ग में अध्यात्म और आस्था का केंद्र बनी रही। यात्रा के दौरान रास्ते भर श्रद्धालु डीजे की धुन और ढोल-नगाड़ों पर थिरकते, भजन गाते और ‘कल्याण धणी की जय’ के गगनभेदी जयकारे लगाते हुए आगे बढ़ते रहे। पदयात्रा में सजी विभिन्न देवी-देवताओं की सजीव झांकियां अत्यंत आकर्षक थीं, वहीं अनेक श्रद्धालुओं ने कठिन दंडवत यात्रा कर अपनी असीम श्रद्धा प्रकट की।

डिग्गीपुरी पहुंचने पर शाम को गाजे-बाजे के साथ एक भव्य शोभायात्रा निकाली गई। इसमें पूज्य संत-महंतों, अतिथियों और श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ पड़ा। स्थानीय निवासियों और विभिन्न सेवा समितियों द्वारा जगह-जगह पुष्पवर्षा कर यात्रियों का स्वागत किया गया।

इसके उपरांत भगवान कल्याणजी महाराज के निज मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की गई और गंगोत्री से लाए गए पवित्र गंगाजल से प्रभु का भव्य अभिषेक संपन्न हुआ। रात्रि में विशाल भजन जागरण का आयोजन हुआ, जिसमें गायक कलाकारों की प्रस्तुतियों पर श्रद्धालु देर रात तक झूमते रहे।

यह पदयात्रा जयपुर से रवाना होकर चार प्रमुख पड़ावों—मदरामपुरा, हरसूलिया, फागी और चौसला होते हुए डिग्गीपुरी पहुंची। प्रत्येक पड़ाव स्थल पर रात्रि विश्राम के दौरान भव्य भजन संध्या, रासलीला और सत्संग के आयोजन किए गए।

सांगानेर और टोंक रोड से लेकर डिग्गी मार्ग तक विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा सैकड़ों सेवा शिविर और भंडारे लगाए गए, जिनमें पदयात्रियों के लिए भोजन, फलाहार, शुद्ध पेयजल, चिकित्सा तथा विश्राम की नि:शुल्क व्यवस्था की गई थी।

श्री कल्याण डिग्गीपुरी लक्खी पदयात्रा संघ के अध्यक्ष श्रीजी शर्मा ने बताया कि 1964 में उनके दादा स्व. रामेश्वर लाल शर्मा द्वारा शुरू की गई यह ऐतिहासिक परंपरा आज तीसरी पीढ़ी पूरी निष्ठा से निभा रही है। 1993 से 2011 तक उनके पिता प्रहलाद राय शर्मा ने इसका कुशल नेतृत्व किया और पिछले 14 वर्षों से वे स्वयं इस यात्रा का संचालन कर रहे हैं।

प्रशासन और पुलिस विभाग की ओर से पूरे यात्रा मार्ग पर सुरक्षा, चिकित्सा और यातायात प्रबंधन के माकूल इंतजाम रहे। अंत में श्रद्धालुओं ने मंदिर में शीश नवाकर सुख-समृद्धि की प्रार्थना की तथा अगले वर्ष पुनः पदयात्रा में शामिल होने का संकल्प लिया।

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