राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में पांडुलिपि संरक्षण कार्यशाला में 250 वर्ष पुरानी शुश्रुत संहिता बनी आकर्षण

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Manuscript Conservation Workshop at the National Institute of Ayurveda
Manuscript Conservation Workshop at the National Institute of Ayurveda

जयपुर। राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान के आयुर्वेद पाण्डुलिपि विज्ञान विभाग द्वारा आयोजित “पांडुलिपियों के संरक्षण एवं परिरक्षण” विषयक चार दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का गुरुवार को समापन हुआ। कार्यशाला में देशभर से आए शोधार्थियों, शिक्षकों और पांडुलिपि विशेषज्ञों ने भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ी अमूल्य धरोहरों के संरक्षण, रिस्टोरेशन और डिजिटलीकरण का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया।

कार्यशाला में ताड़पत्र, भोजपत्र, हस्तनिर्मित कागज, धातु एवं चित्रित पांडुलिपियों के वैज्ञानिक संरक्षण, सतही सफाई, रिपेयरिंग, इंक रिस्टोरेशन, तापमान एवं आर्द्रता नियंत्रण तथा सुरक्षित भंडारण की तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया।

इस दौरान करीब 250 वर्ष पुरानी शुश्रुत संहिता पांडुलिपि विशेष आकर्षण का केंद्र रही। प्राचीन ओड़िया लिपि और संस्कृत-ओड़िया मिश्रित भाषा में लिखित इस पांडुलिपि के संरक्षण और परीक्षण की वैज्ञानिक प्रक्रिया का विशेषज्ञों ने लाइव प्रदर्शन किया।

समापन सत्र में कुलपति प्रो. संजीव शर्मा ने कहा कि भारतीय पांडुलिपियां हमारी वैज्ञानिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य धरोहर हैं, जिनका संरक्षण भविष्य की पीढ़ियों को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने का कार्य है।

विभागाध्यक्ष एवं कार्यशाला के नोडल अधिकारी प्रो. असित कुमार पाञ्जा ने कहा कि यह कार्यशाला भारतीय ज्ञान धरोहरों के संरक्षण का राष्ट्रीय अभियान है। इसमें पांडुलिपियों की रिपेयरिंग, डिजास्टर मैनेजमेंट, सूचीकरण और डिजिटलीकरण जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने प्रशिक्षण दिया।

कार्यशाला में ज्ञानभारतम् और राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन से जुड़े विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों को प्रशिक्षण दिया। समापन पर प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किए गए तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण का संकल्प दिलाया गया।

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