अध्यात्म चिंतन: स्वामी टेऊँराम की वाणी को हिंदी पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग

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Spiritual Reflection: Demand to Include Swami Teunram's Teachings in the Hindi Curriculum
Spiritual Reflection: Demand to Include Swami Teunram's Teachings in the Hindi Curriculum

जयपुर। बीसवीं सदी के युगपुरुष, कर्मयोगी स्वामी टेऊँराम जी महाराज की आध्यात्मिक वाणी को हिंदी पाठ्य पुस्तकों में शामिल करने की मांग तेज हो गई है। संत समाज और अनुयायियों का कहना है कि उनकी रचनाएं समाज को नैतिकता, सेवा और अध्यात्म का मार्ग दिखाती हैं, इसलिए इन्हें शिक्षा प्रणाली में स्थान मिलना चाहिए।

संत टेऊँराम जी महाराज का जन्म 6 जुलाई 1887 को सिंधु नदी के समीप खंडु गांव में हुआ था। उन्होंने कम उम्र में ही स्वामी आसूराम महाराज से दीक्षा लेकर आध्यात्मिक मार्ग अपनाया और आगे चलकर प्रेम प्रकाश मण्डल की स्थापना की। उनका जीवन सनातन धर्म के प्रचार, सेवा और साधना को समर्पित रहा।

उनकी प्रमुख कृति ‘श्री प्रेम प्रकाश ग्रंथ’ में दोहे, पद्य, छंद, भजन और शिक्षाओं का विशाल संग्रह है, जिसमें हजारों रचनाएं संकलित हैं। संत समाज के अनुसार उनकी वाणी की तुलना कबीर, गुरु नानक देव, मीरा बाई और सूरदास जैसे संत कवियों से की जाती है।

स्वामी जी ने 30 वर्ष की आयु में सन्यास ग्रहण किया और ‘ॐ श्री सतनाम साक्षी’ मूल मंत्र दिया, जिसे आज भी लाखों अनुयायी जपते हैं। उनके द्वारा दी गई 16 शिक्षाओं का अनुसरण कर अनुयायी जीवन को सफल बनाने का प्रयास करते हैं। 55 वर्ष की आयु में उनका महानिर्वाण हैदराबाद के अमरापुर दरबार में हुआ।

वर्तमान में जयपुर स्थित श्री अमरापुर स्थान मुख्यालय से प्रेम प्रकाश मण्डल का संचालन किया जा रहा है, जिसकी देश-विदेश में 200 से अधिक शाखाएं हैं। मंडल द्वारा भजन-सत्संग के साथ-साथ अस्पताल, अन्नक्षेत्र, गौशाला, रक्तदान व नि:शुल्क चिकित्सा शिविर जैसे सामाजिक सेवा कार्य भी संचालित किए जा रहे हैं।

संत समाज का कहना है कि स्वामी टेऊँराम जी महाराज की आध्यात्मिक वाणी को हिंदी पाठ्यक्रम में शामिल कर नई पीढ़ी को संस्कार, नैतिकता और भारतीय संस्कृति से जोड़ा जा सकता है।

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